महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1346, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रज्ञायाभ्यधिकाञ्शूरान् गुणयुक्तान् बहूनपि ।
जयन्त्यल्पतरा येन तन्निबोध विशाम्पते ॥ ७ ॥
‘प्रजानाथ! अधिक बुद्धिमान्, उत्तम गुणोंसे युक्त तथा बहुसंख्यक शूरवीरोंको भी बहुत थोड़े योद्धा जिस प्रकार जीत लेते हैं, उसे बताता हूँ, सुनिये— ॥ ७ ॥
तत्र ते कारणं राजन् प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
नारदस्तमृषिर्वेद भीष्मद्रोणौ च पाण्डव ॥ ८ ॥
‘राजन्! आप दोषदृष्टिसे रहित हैं, अतः आपको वह युक्ति बताता हूँ। पाण्डुनन्दन! उसे केवल देवर्षि नारद, भीष्म तथा द्रोणाचार्य जानते हैं ॥ ८ ॥
एनमेवार्थमाश्रित्य युद्धे देवासुरेऽब्रवीत् ।
पितामहः किल पुरा महेन्द्रादीन् दिवौकसः ॥ ९ ॥
‘कहते हैं, पूर्वकालमें जब देवासुर-संग्राम हो रहा था, उस समय इसी विषयको लेकर पितामह ब्रह्माने इन्द्र आदि देवताओंसे इस प्रकार कहा था— ॥ ९ ॥
न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः ।
यथा सत्यानृशंसाभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च ॥ १० ॥
‘विजयकी इच्छा रखनेवाले शूरवीर अपने बल और पराक्रमसे वैसी विजय नहीं पाते, जैसी कि सत्य, सज्जनता, धर्म तथा उत्साहसे प्राप्त कर लेते हैं ॥ १० ॥
त्यक्त्वाधर्मं च लोभं च मोहं चोद्यममास्थिताः ।
युध्यध्वमनहंकारा यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ११ ॥
‘देवताओ! अधर्म, लोभ और मोह त्यागकर उद्यमका सहारा ले अहंकारशून्य होकर युद्ध करो। जहाँ धर्म है उसी पक्षकी विजय होती है’ ॥ ११ ॥
एवं राजन् विजानीहि ध्रुवोऽस्माकं रणे जयः ।
यथा तु नारदः प्राह यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ १२ ॥
‘राजन्! इसी नियमके अनुसार आप भी यह निश्चितरूपसे जान लें कि युद्धमें हमारी विजय अवश्यम्भावी है। जैसा कि नारदजीने कहा है, जहाँ कृष्ण हैं, वहीं विजय है ॥ १२ ॥
गुणभूतो जयः कृष्णे पृष्ठतोऽभ्येति माधवम् ।
तद् यथा विजयश्चास्य सन्नतिश्चापरो गुणः ॥ १३ ॥
‘विजय तो श्रीकृष्णका एक गुण है, अतः वह उनके पीछे-पीछे चलता है। जैसे विजय गुण है, उसी प्रकार विनय भी उनका द्वितीय गुण है ॥ १३ ॥
अनन्ततेजा गोविन्दः शत्रुपूगेषु निर्व्यथः ।
पुरुषः सनातनमयो यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ १४ ॥