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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 971, कुल 2580 में से

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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना

वैशम्पायन उवाच

ते शूरास्ततधन्वानस्तूणवन्तः समागॆणाः ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः खड्गवन्तोऽमितौजसः ॥ १ ॥
परिगृह्य द्विजश्रेष्ठाञ्ज्येष्ठाः सर्वधनुष्मताम् ।
पाञ्चालीसहिता राजन् प्रययुर्गन्धमान्दनम् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें अग्रगण्य वे अमिततेजस्वी शूरवीर पाण्डव धनुष, बाण, तरकश, ढाल और तलवार लिये, हाथोंमें गोहके चमड़ेके बने दस्ताने पहने और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको आगे किये द्रौपदीके साथ गन्धमादन पर्वतकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १-२ ॥

सरांसि सरितश्चैव पर्वतांश्च वनानि च ।
वृक्षांश्च बहुलच्छायान् ददृशुर्गिरिमूर्धनि ॥ ३ ॥

पर्वतके शिखरपर उन्होंने बहुत-से सरोवर, सरिताएँ, पर्वत, वन तथा घनी छायावाले वृक्ष देखे ॥ ३ ॥

नित्यपुष्पफलान् देशान् देवर्षिगणसेवितान् ।
आत्मन्यात्मानमाधाय वीरा मूलफलाशिनः ॥ ४ ॥
चेरुरुच्चावचाकारान् देशान् विषमसंकटान् ।
पश्यन्तो मृगजातानि बहूनि विविधानि च ॥ ५ ॥

उन्हें कितने ही ऐसे स्थान दृष्टिगोचर हुए जहाँ सदा फूल और फलोंकी बहुतायत रहती थी। उन प्रदेशोंमें देवर्षियोंके समुदाय निवास करते थे। वीर पाण्डव अपने मनको परमात्माके चिन्तनमें लगाकर फल-मूलका आहार करते हुए ऊँचे-नीचे विषम-संकटपूर्ण स्थानोंमें विचर रहे थे। मार्गमें उन्हें नाना प्रकारके मृगसमूह दिखायी देते थे जिनकी संख्या बहुत थी ॥ ४-५ ॥

ऋषिसिद्धामरयुतं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम् ।
विविशुस्ते महात्मानः किन्नराचरितं गिरिम् ॥ ६ ॥

इस प्रकार उन महात्मा पाण्डवोंने गन्धर्वों और अप्सराओंकी प्रिय भूमि, किन्नरोंकी क्रीडास्थली तथा ऋषियों, सिद्धों और देवताओंके निवासस्थान गन्धमादन पर्वतकी घाटीमें प्रवेश किया ॥ ६ ॥