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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 941, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 941

बेटा! आज रैभ्यके इस कठोर कर्मसे मुझे पुत्रशोक प्राप्त हुआ है। तुम्हारे बिना मैं इस पृथ्‍वीपर अपने परम प्रिय प्राणोंका भी परित्याग कर दूँगा ।। १४ ।।

यथाहं पुत्रशोकेन देहं त्यक्ष्यामि किल्बिषी ।
तथा ज्येष्ठः सुतो रैभ्यं हिंस्याच्छीघ्रमनागसम् ।। १५ ।।
जैसे मैं पापी अपने पुत्रके शोकसे व्याकुल हो अपने शरीरका त्याग कर रहा हूँ, उसी प्रकार रैभ्यका ज्येष्ठ पुत्र अपने निरपराध पिताकी शीघ्र हत्या कर डालेगा ।। १५ ।।

सुखिनो वै नरा येषां जात्या पुत्रो न विद्यते ।
ते पुत्रशोकमप्राप्य विचरन्ति यथासुखम् ।। १६ ।।
संसारमें वे मनुष्य सुखी हैं, जिन्हें पुत्र पैदा ही नहीं हुआ है; क्योंकि वे पुत्रशोकका अनुभव न करके सदा सुखपूर्वक विचरते हैं ।। १६ ।।

ये तु पुत्रकृताच्छोकाद् भृशं व्याकुलचेतसः ।
शपन्तीष्टान् सखीनार्तास्तेभ्यः पापतरो नु कः ।। १७ ।।
जो पुत्रशोकसे मन-ही-मन व्याकुल हो गहरी व्यथाका अनुभव करते हुए अपने प्रिय मित्रोंको भी शाप दे डालते हैं, उनसे बढ़कर महापापी दूसरा कौन हो सकता है? ।। १७ ।।

परासुश्च सुतो दृष्टः शप्तश्चेष्टः सखा मया ।
ईदृशीमापदं कोऽत्र द्वितीयोऽनुभविष्यति ।। १८ ।।
मैंने अपने पुत्रकी मृत्यु देखी और प्रिय मित्रको शाप दे दिया। मेरे सिवा संसारमें दूसरा कौन-सा मनुष्य है जो ऐसी विपत्तिका अनुभव करेगा ।। १८ ।।

लोमश उवाच

विलप्यैवं बहुविधं भरद्वाजोऽदहत् सुतम् ।
सुसमिद्धं ततः पश्चात् प्रविवेश हुताशनम् ।। १९ ।।
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस तरह भाँति-भाँतिके विलाप करके भरद्वाजने अपने पुत्रका दाह-संस्कार किया। तत्पश्चात् स्वयं भी वे जलती आगमें प्रवेश कर गये ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३७ ।।