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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 907, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 907

तुम्हारी और भी कोई कामना हो तो वे पूरी करेंगे ।।
अष्टावक्र उवाच

भो भो राजञ्जनकानां वरिष्ठ
त्वं वै सम्राट् त्वयि सर्वं समृद्धम् ।
त्वं वा कर्ता कर्मणां यज्ञियानां
ययातिरेको नृपतिर्वा पुरस्तात् ।। १७ ।।
अष्टावक्र बोले— राजन्! आप जनकवंशके श्रेष्ठ पुरुष हैं, सम्राट् हैं। आपके यहाँ सभी प्रकारके ऐश्वर्य परिपूर्ण हैं, वर्तमान समयमें केवल आप ही उत्तम यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले हैं; अथवा पूर्वकालमें एकमात्र राजा ययाति ऐसे हो चुके हैं ।। १७ ।।

वृद्धान् बन्दी वादविदो निगृह्य
वादे भग्नानप्रतिशङ्कमानः ।
त्वयाभिसृष्टैः पुरुषैराप्तकृद्भि-
र्जले सर्वान् मज्जयतीति नः श्रुतम् ।। १८ ।।
हमने सुना है कि आपके यहाँ बन्दी नामसे प्रसिद्ध कोई विद्वान् हैं जो वाद-विवादके मर्मको जाननेवाले कितने ही वृद्ध ब्राह्मणोंको शास्त्रार्थमें हराकर वशमें कर लेते हैं और फिर आपके ही दिये हुए विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा उन सबको निःशंक होकर पानीमें डुबवा देते हैं ।। १८ ।।

सोऽहं श्रुत्वा ब्राह्मणानां सकाशाद्
ब्रह्माद्वैतं कथयितुमागतोऽस्मि ।
क्वासौ बन्दी यावदेनं समेत्य
नक्षत्राणीव सविता नाशयामि ।। १९ ।।
मैं ब्राह्मणोंके समीप यह समाचार सुनकर अद्वैत ब्रह्मके विषयमें वर्णन करनेके लिये यहाँ आया हूँ। वे बन्दी कहाँ हैं? मैं उनसे मिलकर उनके तेजको उसी प्रकार शान्त कर दूँगा, जैसे सूर्य ताराओंकी ज्योतिको विलुप्त कर देते हैं ।। १९ ।।

राजोवाच

आशंससे बन्दिनं वै विजेतु-
मविज्ञाय त्वं वाक्यबलं परस्य ।
विज्ञातवीर्यैः शक्यमेवं प्रवक्तुं
दृष्टश्चासौ ब्राह्मणैर्वेदशीलैः ।। २० ।।
राजा बोले— ब्राह्मणकुमार! तुम अपने विपक्षीकी प्रवचन-शक्तिको जाने बिना ही बन्दीको जीतनेकी इच्छा रखते हो। जो प्रतिवादीके बलको जानते हों वे ही ऐसी बातें कह