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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 905, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 905

अज्ञात्मानं समवेक्षस्व बालं
किं श्लाघसे दुर्लभो वै मनीषी ॥ ८ ॥
**द्वारपालने कहा—**ब्राह्मणकुमार! तुम वेद-प्रतिपादित, एकाक्षरब्रह्मका बोध करानेवाली, अनेक रूपवाली, सुन्दर वाणीका उच्चारण करो और अपने-आपको बालक ही समझो, स्वयं ही अपनी प्रशंसा क्यों करते हो? इस जगत्में ज्ञानी दुर्लभ हैं ॥ ८ ॥

अष्टावक्र उवाच

न ज्ञायते कायवृद्ध्या विवृद्धि-
र्यथाष्ठीला शाल्मलेः सम्प्रवृद्धा ।
ह्रस्वोऽल्पकायः फलितो विवृद्धो
यश्चाफलस्तस्य न वृद्धभावः ॥ ९ ॥
**अष्टावक्र बोले—**द्वारपाल! केवल शरीर बढ़ जानेसे किसीकी बढ़ती नहीं समझी जाती है। जैसे सेमलके फलकी गाँठ बढ़नेपर भी सारहीन होनेके कारण वह व्यर्थ ही है। छोटा और दुबला-पतला वृक्ष भी यदि फलोंके भारसे लदा है तो उसे ही वृद्ध (बड़ा) जानना चाहिये। जिसमें फल नहीं लगते, उस वृक्षका बढ़ना भी नहीं के बराबर है ॥ ९ ॥

द्वारपाल उवाच

वृद्धेभ्य एवेह मतिं स्म बाला
गृह्णन्ति कालेन भवन्ति वृद्धाः ।
न हि ज्ञानमल्पकालेन शक्यं
कस्माद् बालः स्थविर इव प्रभाषसे ॥ १० ॥
**द्वारपालने कहा—**बालक बड़े-बूढ़ोंसे ही ज्ञान प्राप्त करते हैं और समयानुसार वे भी वृद्ध होते हैं। थोड़े समयमें ज्ञानकी प्राप्ति असम्भव है, अतः तुम बालक होकर भी क्यों वृद्धकी-सी बातें करते हो? ॥ १० ॥

अष्टावक्र उवाच

न तेन स्थविरो भवति येनास्य पलितं शिरः ।
बालोऽपि यः प्रजानाति तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ ११ ॥
**अष्टावक्र बोले—**अमुक व्यक्तिके सिरके बाल पक गये हैं, इतने ही मात्रसे वह बूढ़ा नहीं होता है, अवस्थामें बालक होनेपर भी जो ज्ञानमें बढ़ा-चढ़ा है, उसीको देवगण वृद्ध मानते हैं ॥ ११ ॥

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ १२ ॥

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