महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 901, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु-
रष्टावक्रं पितुरङ्के निषण्णम् ।
अपाकर्षद् गृह्य पाणौ रुदन्तं
नायं तवाङ्कः पितुरित्युक्तवांश्च ॥ १८ ॥
तदनन्तर एक दिन, जब अष्टावक्रकी आयु बारह वर्षकी थी और वे पितृतुल्य उद्दालक मुनिकी गोदमें बैठे हुए थे, उसी समय श्वेतकेतु वहाँ आये और रोते हुए अष्टावक्रका हाथ पकड़कर उन्हें दूर खींच ले गये। इस प्रकार अष्टावक्रको दूर हटाकर श्वेतकेतुने कहा—'यह तेरे बापकी गोदी नहीं है' ॥ १८ ॥
यत् तेनोक्तं दुरुक्तं तत् तदानीं
हृदि स्थितं तस्य सुदुःखमासीत् ।
गृहं गत्वा मातरं सोऽभिगम्य
पप्रच्छेदं क्व नु तातो ममेति ॥ १९ ॥
श्वेतकेतुकी उस कटूक्तिने उस समय अष्टावक्रके हृदयमें गहरी चोट पहुँचायी। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने घरमें माताके पास जाकर पूछा—'माँ! मेरे पिताजी कहाँ हैं?' ॥ १९ ॥
ततः सुजाता परमार्तरूपा
शापाद् भीता सर्वमेवाचचक्षे ।
तद् वै तत्त्वं सर्वमाज्ञाय रात्रा-
वित्यब्रवीच्छ्वेतकेतुं स विप्रः ॥ २० ॥
गच्छाव यज्ञं जनकस्य राज्ञो
बह्वाश्चर्यः श्रूयते तस्य यज्ञः ।
श्रोष्यावोऽत्र ब्राह्मणानां विवाद-
मर्थं चाग्र्यं तत्र भोक्ष्यावहे च ॥ २१ ॥
बालकके इस प्रश्नसे सुजाताके मनमें बड़ी व्यथा हुई, उसने शापके भयसे घबराकर सब बात बता दी। यह सब रहस्य जानकर उन्होंने रातमें श्वेतकेतुसे इस प्रकार कहा—'हम दोनों राजा जनकके यज्ञमें चलें। सुना जाता है, उस यज्ञमें बड़े आश्चर्यकी बातें देखनेमें आती हैं। हम दोनों वहाँ विद्वान् ब्राह्मणोंका शास्त्रार्थ सुनेंगे और वहीं उत्तम पदार्थ भोजन करेंगे ॥ २०-२१ ॥
विचक्षणत्वं च भविष्यते नौ
शिवश्च सौम्यश्च हि ब्रह्मघोषः ॥ २२ ॥
'वहाँ जानेसे हमलोगोंकी प्रवचनशक्ति एवं जानकारी बढ़ेगी और हमें सुमधुर स्वरमें वेद-मन्त्रोंका कल्याणकारी घोष सुननेका अवसर