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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 870, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 870

आजगव नामक धनुष, सींगके बने हुए बाण और अभेद्य कवच—सभी तत्काल उनकी सेवामें आ गये।।
सोऽभिषिक्तो मघवता स्वयं शक्रेण भारत।
धर्मेण व्यजयल्लोकांस्त्रीन् विष्णुरिव विक्रमैः।। ३५ ।।
भारत! साक्षात् देवराज इन्द्रने मान्धाताका राज्याभिषेक किया। भगवान् विष्णुने जैसे तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया था, उसी प्रकार मान्धाताने भी धर्मके द्वारा तीनों लोकोंको जीत लिया।। ३५ ।।
तस्याप्रतिहतं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः।
रत्नानि चैव राजर्षिं स्वयमेवोपतस्थिरे ।। ३६ ।।
उन महात्मा नरेशका शासनचक्र सर्वत्र बेरोक-टोक चलने लगा। सारे रत्न राजर्षि मान्धाताके यहाँ स्वयं उपस्थित हो जाते थे।। ३६ ।।
तस्यैवं वसुसम्पूर्णा वसुधा वसुधाधिप।
तेनेष्टं विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।। ३७ ।।
युधिष्ठिर! इस प्रकार उनके लिये यह सारी पृथ्वी धन-रत्नोंसे परिपूर्ण थी। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले नाना प्रकारके बहुसंख्यक यज्ञोंद्वारा भगवान्‌की समाराधना की।। ३७ ।।
चितचैत्यो महातेजा धर्मान् प्राप्य च पुष्कलान्।
शक्रस्यार्धासनं राजँल्लब्धवानमितद्युतिः ।। ३८ ।।
राजन्! महातेजस्वी एवं परम कान्तिमान् राजा मान्धाताने यज्ञमण्डपोंका निर्माण करके पर्याप्त धर्मका सम्पादन किया और उसीके फलसे स्वर्गलोकमें इन्द्रका आधा सिंहासन प्राप्त कर लिया।। ३८ ।।
एकाहात् पृथिवी तेन धर्मनित्येन धीमता।
विजिता शासनादेव सरत्नाकरपत्तना ।। ३९ ।।
उन धर्मपरायण बुद्धिमान् नरेशने केवल शासनमात्रसे एक ही दिनमें समुद्र, खान और नगरोंसहित सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर ली।। ३९ ।।
तस्य चैत्यैर्महाराज ऋतूनां दक्षिणावताम्।
चतुरन्ता मही व्याप्ता नासीत् किंचिदनावृतम् ।। ४० ।।
महाराज! उनके दक्षिणायुक्त यज्ञोंके चैत्यों (यज्ञमण्डपों)-से चारों ओरकी पृथ्वी भर गयी थी, कहीं कोई भी स्थान ऐसा नहीं था जो उनके यज्ञमण्डपोंसे घिरा न हो।। ४० ।।
तेन पद्मसहस्राणि गवां दश महात्मना।
ब्राह्मणानां महाराज दत्तानीति प्रचक्षते ।। ४१ ।।
महाराज! महात्मा राजा मान्धाताने दस हजार पद्म गौएँ ब्राह्मणोंको दानमें दी थीं, ऐसा जानकार-लोग कहते हैं।। ४१ ।।