महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोमश उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञो गङ्गा लोकनमस्कृता ।
भगीरथमिदं वाक्यं सुप्रीता समभाषत ॥ २१ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! राजा भगीरथकी यह बात सुनकर विश्ववन्दिता गंगा अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उनसे इस प्रकार बोलीं— ॥ २१ ॥
करिष्यामि महाराज वचस्ते नात्र संशयः ।
वेगं तु मम दुर्धार्यं पतन्त्या गगनाद् भुवम् ॥ २२ ॥
'महाराज! मैं तुम्हारी बात मानूँगी, इसमें संशय नहीं है; परंतु आकाशसे पृथ्वीपर गिरते समय मेरे वेगको रोकना बहुत कठिन है ॥ २२ ॥
न शक्तस्त्रिषु लोकेषु कश्चिद् धारयितुं नृप ।
अन्यत्र विबुधश्रेष्ठान्नीलकण्ठान्महेश्वरात् ॥ २३ ॥
'राजन्! देवश्रेष्ठ महेश्वर नीलकण्ठको छोड़कर तीनों लोकोंमें कोई भी मेरा वेग धारण नहीं कर सकता ॥ २३ ॥
तं तोषय महाबाहो तपसा वरदं हरम् ।
स तु मां प्रच्युतां देवः शिरसा धारयिष्यति ॥ २४ ॥