महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 699, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्यथा नोपतिष्ठेयं चरिकाषायवासिनी ।
नैवापवित्रो विप्रर्षे भूषणोऽयं कथंचन ॥ १९ ॥
‘अन्यथा मैं यह जीर्ण-शीर्ण काषाय-वस्त्र पहनकर आपके साथ समागम नहीं करूँगी। ब्रह्मर्षे! तपस्वीजनोंका यह पवित्र आभूषण किसी प्रकार सम्भोग आदिके द्वारा अपवित्र नहीं होना चाहिये’ ॥ १९ ॥
अगस्त्य उवाच
न ते धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम ।
यथाविधानि कल्याणि पितुस्तव सुमध्यमे ॥ २० ॥
अगस्त्यजीने कहा—सुन्दर कटिप्रदेशवाली कल्याणी लोपामुद्रे! तुम्हारे पिताके घरमें जैसे धन-वैभव हैं, वे न तो तुम्हारे पास हैं और न मेरे ही पास (फिर ऐसा कैसे हो सकता है?) ॥ २० ॥
लोपामुद्रोवाच
ईशोऽसि तपसा सर्वं समाहर्तुं तपोधन ।
क्षणेन जीवलोके यद् वसु किंचन विद्यते ॥ २१ ॥
लोपामुद्रा बोली—तपोधन! इस जीव-जगत्में जो कुछ भी धन है, वह सब क्षणभरमें आप अपनी तपस्याके प्रभावसे जुटा लेनेमें समर्थ हैं ॥ २१ ॥
अगस्त्य उवाच
एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत् ।
यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय ॥ २२ ॥
अगस्त्यजीने कहा—प्रिये! तुम्हारा कथन ठीक है। परंतु ऐसा करनेसे तपस्याका क्षय होगा। मुझे ऐसा कोई उपाय बताओ, जिससे मेरी तपस्या क्षीण न हो ॥ २२ ॥
लोपामुद्रोवाच
अल्पावशिष्टः कालोऽयमृतोर्मम तपोधन ।
न चान्यथाहमिच्छामि त्वामुपैतुं कथंचन ॥ २३ ॥
लोपामुद्रा बोली—तपोधन! मेरे ऋतुकालका थोड़ा ही समय शेष रह गया है। मैं जैसा बता चुकी हूँ, उसके सिवा और किसी तरह आपसे समागम नहीं करना चाहती ॥ २३ ॥
न चापि धर्ममिच्छामि विलोप्तुं ते कथंचन ।
एवं तु मे यथाकामं सम्पादयितुमर्हसि ॥ २४ ॥
साथ ही मेरी यह भी इच्छा नहीं है कि किसी प्रकार आपके धर्मका लोप हो। इस प्रकार अपने तप एवं धर्मकी रक्षा करते हुए जिस तरह सम्भव हो उसी तरह आप मेरी इच्छा पूर्ण करें ॥ २४ ॥