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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 658

कुन्तीनन्दन! उसी क्षेत्रमें अशोकतीर्थ है, जहाँ महर्षियोंके बहुत-से आश्रम हैं। युधिष्ठिर! पाण्ड्यदेशमें अगस्त्यतीर्थ और वारुणतीर्थ है। नरश्रेष्ठ! पाण्ड्यदेशके भीतर पवित्र कुमारी कन्याएँ (कन्याकुमारी तीर्थ) कही गयी हैं। कुन्तीकुमार! अब मैं तुमसे ताम्रपर्णी नदीकी महिमाका वर्णन करूँगा, सुनो ॥ १३-१४ ॥
यत्र देवैस्तपस्तप्तं महदिच्छद्भिराश्रमे ।
गोकर्ण इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १५ ॥
भरतनन्दन! वहाँ मोक्ष पानेकी इच्छासे देवताओंने आश्रममें रहकर बड़ी भारी तपस्या की थी। वहाँका गोकर्णतीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ १५ ॥
शीततोयो बहुजलः पुण्यस्तात शिवः शुभः ।
ह्रदः परमदुष्प्रापो मानुषैरकृतात्मभिः ॥ १६ ॥
तात! गोकर्णतीर्थमें शीतल जल भरा रहता है। उसकी जलराशि अनन्त है। वह पवित्र, कल्याणमय और शुभ है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, ऐसे मनुष्योंके लिये गोकर्णतीर्थ अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १६ ॥
तत्र वृक्षतृणाद्यैश्च सम्पन्नः फलमूलवान् ।
आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य पुण्यो देवसमो गिरिः ॥ १७ ॥
वहाँ अगस्त्यके शिष्यका पुण्यमय आश्रम है, जो वृक्षों और तृण आदिसे सम्पन्न एवं फल-मूलोंसे परिपूर्ण है। देवसम नामक पर्वत ही वह आश्रम है ॥ १७ ॥
वैदूर्यपर्वतस्तत्र श्रीमान् मणिमयः शिवः ।
अगस्त्यस्याश्रमश्चैव बहुमूलफलोदकः ॥ १८ ॥
वहाँ परम सुन्दर मणिमय वैदूर्यपर्वत है जो शिवस्वरूप है। उसीपर महर्षि अगस्त्यका आश्रम है जो प्रचुर फल-मूल और जलसे सम्पन्न है ॥ १८ ॥
सुराष्ट्रेष्वपि वक्ष्यामि पुण्यान्यायतनानि च ।
आश्रमान् सरितश्चैव सरांसि च नराधिप ॥ १९ ॥
नरेश्वर! अब मैं सुराष्ट्र (सौराष्ट्र)-देशीय पुण्य-स्थानों, मन्दिरों, आश्रमों, सरिताओं और सरोवरोंका वर्णन करता हूँ ॥ १९ ॥
चमसोद्भेदनं विप्रास्तत्रापि कथयन्त्युत ।
प्रभासं चोदधौ तीर्थं त्रिदशानां युधिष्ठिर ॥ २० ॥
विप्रगण! वहीं चमसोद्भेदतीर्थकी चर्चा की जाती है। युधिष्ठिर! सुराष्ट्रमें ही समुद्रके तटपर प्रभासक्षेत्र है जो देवताओंका तीर्थ कहा गया है ॥ २० ॥
तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शिवम् ।
उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान् ॥ २१ ॥
वहीं पिण्डारक नामक तीर्थ है जो तपस्वी जनोंद्वारा सेवित और कल्याणस्वरूप है। उधर ही उज्जयन्त नामक महान् पर्वत है जो शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला है ॥ २१ ॥