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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 614

लेता है ।। २३-२४ ।।
प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ ।
धारां नाम महाप्राज्ञः सर्वपापप्रमोचनीम् ।। २५ ।।
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर महाप्राज्ञ पुरुष उस तीर्थकी परिक्रमा करके धाराकी यात्रा करे, जो सब पापोंसे छुड़ानेवाली है ।। २५ ।।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र न शोचति नराधिप ।
नरव्याघ्र! नराधिप! वहाँ स्नान करके मनुष्य कभी शोकमें नहीं पड़ता ।। २५½ ।।
ततो गच्छेत धर्मज्ञ नमस्कृत्य महागिरिम् ।। २६ ।।
स्वर्गद्वारेण यत् तुल्यं गङ्गाद्वारं न संशयः ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत कोटितीर्थे समाहितः ।। २७ ।।
धर्मज्ञ! वहाँसे महापर्वत हिमालयको नमस्कार करके गंगाद्वार (हरिद्वार)-की यात्रा करे, जो स्वर्गद्वारके समान है; इसमें संशय नहीं है। वहाँ एकाग्रचित्त हो कोटितीर्थमें स्नान करे ।। २६-२७ ।।
पुण्डरीकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।
उष्यैकां रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ।। २८ ।।
ऐसा करनेवाला मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है। वहाँ एक रात निवास करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ।। २८ ।।
सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च शक्रावर्ते च तर्पयन् ।
देवान् पितृंश्च विधिवत् पुण्ये लोके महीयते ।। २९ ।।
सप्तगंग, त्रिगंग और शक्रावर्ततीर्थमें विधिपूर्वक देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करनेवाला मनुष्य पुण्य-लोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। २९ ।।
ततः कनखले स्नात्वा त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ३० ।।
तदनन्तर कनखलमें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्ग-लोकमें जाता है ।। ३० ।।
कपिलावटं ततो गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।
उपोष्य रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ।। ३१ ।।
नरेश्वर! उसके बाद तीर्थसेवी मनुष्य कपिलावट-तीर्थमें जाय। वहाँ रातभर उपवास करनेसे उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ।। ३१ ।।
नागराजस्य राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः ।
तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ सर्वलोकेषु विश्रुतम् ।। ३२ ।।
राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ! वहीं नागराज महात्मा कपिलका तीर्थ है, जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात है ।। ३२ ।।