महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः ॥ ५१ ॥
शीतकालकी वायुसे पीड़ित जगत्को अग्नि, कम्बल और वस्त्र भी उतना सुख नहीं देते जितना आपकी किरणें देती हैं ॥ ५१ ॥
त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम् ।
त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे ॥ ५२ ॥
आप अपनी किरणोंद्वारा तेरह* द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीको प्रकाशित करते हैं; और अकेले ही तीनों लोकोंके हितके लिये तत्पर रहते हैं ॥ ५२ ॥
तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत् ।
न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन् मनीषिणः ॥ ५३ ॥
यदि आपका उदय न हो तो यह सारा जगत् अंधा हो जाय और मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ एवं कामसम्बन्धी कर्मोंमें प्रवृत्त ही न हों ॥ ५३ ॥
आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः ।
त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः ॥ ५४ ॥
गर्भाधान या अग्निकी स्थापना, पशुओंको बाँधना, इष्टि (पूजा), मन्त्र, यज्ञानुष्ठान और तप आदि समस्त क्रियाएँ आपकी ही कृपासे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यगणों द्वारा सम्पन्न की जाती हैं ॥ ५४ ॥
यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम् ।
तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः ॥ ५५ ॥
ब्रह्माजीका जो एक सहस्र युगोंका दिन बताया गया है, कालमानके जाननेवाले विद्वानोंने उसका आदि और अन्त आपको ही बताया है ॥ ५५ ॥
मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च ।
मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः ॥ ५६ ॥
मनु और मनुपुत्रोंके, जगत्के, (ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले) अमानव पुरुषके, समस्त मन्वन्तरोंके तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर आप ही हैं ॥ ५६ ॥
संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः ।
संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते ॥ ५७ ॥
प्रलयकाल आनेपर आपके ही क्रोधसे प्रकट हुई संवर्तक नामक अग्नि तीनों लोकोंको भस्म करके फिर आपमें ही स्थित हो जाती है ॥ ५७ ॥
त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः ।
सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम् ॥ ५८ ॥
आपकी ही किरणोंसे उत्पन्न हुए रंग-बिरंगे ऐरावत आदि महामेघ और बिजलियाँ सम्पूर्ण भूतोंका संहार करती हैं ॥ ५८ ॥
कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः ।