सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 522

विश्राम्यतामित्युवाच क्लान्तोऽसीति पुनः पुनः ।
स सत्कृतः प्रहृष्टात्मा प्रीतः प्रीतेन पार्थिवः ॥ २९ ॥
और कहा—'आप बहुत थक गये होंगे, अतः विश्राम कीजिये।' विदर्भनरेशके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक आदर-सत्कार पाकर राजा ऋतुपर्णको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २९ ॥
राजप्रेष्यैरनुगतो दिष्टं वेश्म समाविशत् ।
ऋतुपर्णे गते राजन् वार्ष्णेयसहिते नृपे ॥ ३० ॥
बाहुको रथमादाय रथशालामुपागमत् ।
स मोचयित्वा तानश्वानुपचर्य च शास्त्रतः ॥ ३१ ॥
स्वयं चैतान् समाश्वास्य रथोपस्थ उपाविशत् ।
फिर वे राजसेवकोंके साथ गये और बताये हुए भवनमें विश्रामके लिये प्रवेश किया। राजन्! वार्ष्णेयसहित ऋतुपर्णके चले जानेपर बाहुक रथ लेकर रथशालामें गया। उसने उन घोड़ोंको खोल दिया और अश्वशास्त्रकी विधिके अनुसार उनकी परिचर्या करनेके बाद घोड़ोंको पुचकारकर उन्हें धीरज देनेके पश्चात् वह स्वयं भी रथके पिछले भागमें जा बैठा ॥ ३०-३१ १/२ ॥
दमयन्त्यपि शोकार्ता दृष्ट्वा भाङ्गासुरिं नृपम् ॥ ३२ ॥
सूतपुत्रं च वार्ष्णेयं बाहुकं च तथाविधम् ।
चिन्तयामास वैदर्भी कस्यैष रथनिःस्वनः ॥ ३३ ॥
दमयन्ती भी शोकसे आतुर हो राजा ऋतुपर्ण, सूतपुत्र वार्ष्णेय तथा पूर्वोक्त बाहुकको देखकर सोचने लगी—'यह किसके रथकी घरघराहट सुनायी पड़ती थी ॥ ३२-३३ ॥
नलस्येव महानासीन्न च पश्यामि नैषधम् ।
वार्ष्णेयेन भवेन्नूनं विद्या सैवोपशिक्षिता ॥ ३४ ॥
तेनाद्य रथनिर्घोषो नलस्येव महानभूत् ।
आहोस्विदृऋतुपर्णोऽपि यथा राजा नलस्तथा ।
यथायं रथनिर्घोषो नैषधस्येव लक्ष्यते ॥ ३५ ॥
'वह गम्भीर घोष तो महाराज नलके रथ-जैसा था; परंतु इन आगन्तुकोंमें मुझे निषधराज नल नहीं दिखायी देते। वार्ष्णेयने भी नलके समान ही अश्वविद्या सीख ली हो, निश्चय ही यह सम्भावना की जा सकती है। तभी आज रथकी आवाज बड़े जोरसे सुनायी दे रही थी, जैसे नलके रथ हाँकते समय हुआ करती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि राजा ऋतुपर्ण भी वैसे ही अश्वविद्यामें निपुण हों, जैसे राजा नल हैं; क्योंकि नलके ही समान इनके रथका भी गम्भीर घोष लक्षित होता है' ॥ ३४-३५ ॥
एवं सा तर्कयित्वा तु दमयन्ती विशाम्पते ।
दूतीं प्रस्थापयामास नैषधान्वेषणे शुभा ॥ ३६ ॥