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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 508

शुद्धान् दशभिरावर्तैः सिन्धुजान् वातरंहसः ।
दृष्ट्वा तानब्रवीद् राजा किंचित् कोपसमन्वितः ॥ १४ ॥
वे वायुके समान वेगशाली सिन्धुदेशके घोड़े थे। वे दस आवर्त (भँवरियों)-के चिह्नोंसे युक्त होनेके कारण निर्दोष थे। उन्हें देखकर राजा ऋतुपर्णने कुछ कुपित होकर कहा— ॥ १४ ॥
किमिदं प्रार्थितं कर्तुं प्रलब्धव्या न ते वयम् ।
कथमल्पबलप्राणा वक्ष्यन्तीमे हया मम ।
महदध्वानमपि च गन्तव्यं कथमीदृशैः ॥ १५ ॥
'क्या तुमसे ऐसे ही घोड़े चुननेके लिये कहा था, तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रहे हो। ये अल्प बल और शक्तिवाले घोड़े कैसे मेरा इतना बड़ा रास्ता तय कर सकेंगे? ऐसे घोड़ोंसे इतनी दूरतक रथ कैसे ले जाया जायगा?' ॥ १५ ॥

बाहुक उवाच
एको ललाटे द्वौ मूर्ध्नि द्वौ द्वौ पार्श्वोपपार्श्वयोः ।
द्वौ द्वौ वक्षसि विज्ञेयौ प्रयाणे चैक एव तु ॥ १६ ॥
बाहुकने कहा—राजन्! ललाटमें एक, मस्तकमें दो, पार्श्वभागमें दो, उपपार्श्वभागमें भी दो, छातीमें दोनों ओर दो दो और पीठमें एक—इस प्रकार कुल बारह भँवरियोंको पहचानकर घोड़े रथमें जोतने चाहिये ॥ १६ ॥
एते हया गमिष्यन्ति विदर्भान् नात्र संशयः ।
यानन्यान् मन्यसे राजन् ब्रूहि तान् योजयामि ते ॥ १७ ॥
ये मेरे चुने हुए घोड़े अवश्य विदर्भदेशकी राजधानीतक पहुँचेंगे, इसमें संशय नहीं है। महाराज! इन्हें छोड़कर आप जिनको ठीक समझें, उन्हींको मैं रथमें जोत दूँगा ॥ १७ ॥

ऋतुपर्ण उवाच
त्वमेव हयतत्त्वज्ञः कुशलो ह्यसि बाहुक ।
यान् मन्यसे समर्थांस्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय ॥ १८ ॥
ऋतुपर्ण बोले—बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ और कुशल हो, अतः तुम जिन्हें इस कार्यमें समर्थ समझो, उन्हींको शीघ्र जोतो ॥ १८ ॥
ततः सदश्वांश्चतुरः कुलशीलसमन्वितान् ।
योजयामास कुशलो जवयुक्तान् रथे नलः ॥ १९ ॥
तब चतुर एवं कुशल राजा नलने अच्छी जाति और उत्तम स्वभावके चार वेगशाली घोड़ोंको रथमें जोता ॥ १९ ॥
ततो युक्तं रथं राजा समारोहत् त्वरान्वितः ।
अथ पर्यपतन् भूमौ जानुभिस्ते हयोत्तमाः ॥ २० ॥