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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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यदि वासौ समृद्धः स्याद् यदि वाप्यधनो भवेत् ।
यदि वाप्यसमर्थः स्याज्ज्ञेयमस्य चिकीर्षितम् ॥ ४७ ॥
‘उत्तर देनेवाला पुरुष धनवान् हो या निर्धन, समर्थ हो या असमर्थ, वह क्या करना चाहता है, इस बातको जाननेका प्रयत्न कीजिये’ ॥ ४७ ॥
एवमुक्तास्त्वगच्छंस्ते ब्राह्मणाः सर्वतो दिशम् ।
नलं मृगयितुं राजंस्तदा व्यसनिनं तथा ॥ ४८ ॥
ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान् घोषांस्तथाऽऽश्रमान् ।
अन्वेषन्तो नलं राजन् नाधिजग्मुर्द्विजातयः ॥ ४९ ॥
राजन्! दमयन्तीके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण संकटमें पड़े हुए राजा नलको ढूँढ़नेके लिये सब दिशाओंकी ओर चले गये। युधिष्ठिर! उन ब्राह्मणोंने नगरों, राष्ट्रों, गाँवों, गोष्ठों तथा आश्रमोंमें भी नलका अन्वेषण किया; किंतु उन्हें कहीं भी उनका पता न लगा ॥ ४८-४९ ॥
तच्च वाक्यं तथा सर्वे तत्र तत्र विशाम्पते ।
श्रावयांचक्रिरे विप्रा दमयन्त्या यथेरितम् ॥ ५० ॥
महाराज! दमयन्तीने जैसा बताया था, उस वाक्यको सभी ब्राह्मण भिन्न-भिन्न स्थानोंमें जाकर लोगोंको सुनाया करते थे ॥ ५० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलान्वेषणे
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी खोजविषयक
उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥