सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

तस्याः स्वयंवरः शक्र भविता न चिरादिव ।
तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥ २२ ॥
इन्द्र! अब शीघ्र ही उसका स्वयंवर होनेवाला है, उसीमें सब राजा तथा राजकुमार जा रहे हैं ॥ २२ ॥

तां रत्नभूतां लोकस्य प्रार्थयन्तो महीक्षितः ।
काङ्क्षन्ति स्म विशेषेण बलवृत्रनिषूदन ॥ २३ ॥
बल और वृत्रासुरके नाशक इन्द्र! दमयन्ती सम्पूर्ण जगत्का एक अद्भुत रत्न है। इसलिये सब राजा उसे पानेकी विशेष अभिलाषा रखते हैं ॥ २३ ॥

एतस्मिन् कथ्यमाने तु लोकपालाश्च साग्निकाः ।
आजग्मुर्देवराजस्य समीपममरोत्तमाः ॥ २४ ॥
यह बात हो ही रही थी कि देवश्रेष्ठ लोकपालगण अग्निसहित देवराजके समीप आये ॥ २४ ॥

ततस्ते शुश्रुवुः सर्वे नारदस्य वचो महत् ।
श्रुत्वैव चाब्रुवन् हृष्टा गच्छामो वयमप्युत ॥ २५ ॥
तदनन्तर उन सबने नारदजीकी ये विशिष्ट बातें सुनीं। सुनते ही वे सब-के-सब हर्षोल्लाससे परिपूर्ण हो बोले—‘हमलोग भी उस स्वयंवरमें चलें' ॥ २५ ॥

ततः सर्वे महाराज सगणाः सहवाहनाः ।
विदर्भानभिजग्मुस्ते यतः सर्वे महीक्षितः ॥ २६ ॥
महाराज! तदनन्तर वे सब देवता अपने सेवकगणों और वाहनोंके साथ विदर्भदेशमें गये, जहाँ समस्त भूपाल एकत्र हुए थे ॥ २६ ॥

नलोऽपि राजा कौन्तेय श्रुत्वा राज्ञां समागमम् ।
अभ्यगच्छददीनात्मा दमयन्तीमनुव्रतः ॥ २७ ॥
कुन्तीनन्दन! उदारहृदय राजा नल भी विदर्भनगरमें समस्त राजाओंका समागम सुनकर दमयन्तीमें अनुरक्त हो वहाँ गये ॥ २७ ॥

अथ देवाः पथि नलं ददृशुर्भूतले स्थितम् ।
साक्षादिव स्थितं मूर्त्या मन्मथं रूपसम्पदा ॥ २८ ॥
उस समय देवताओंने पृथ्वीपर मार्गमें खड़े हुए राजा नलको देखा। रूप-सम्पत्तिकी दृष्टिसे वे साक्षात् मूर्तिमान् कामदेव-से जान पड़ते थे ॥ २८ ॥

तं दृष्ट्वा लोकपालास्ते भ्राजमानं यथा रविम् ।
तस्थुर्विगतसंकल्पा विस्मिता रूपसम्पदा ॥ २९ ॥
सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले महाराज नलको देखकर वे लोकपाल उनके रूप-वैभवसे चकित हो दमयन्तीको पानेका संकल्प छोड़ बैठे ॥ २९ ॥

ततोऽन्तरिक्षे विष्टभ्य विमानानि दिवौकसः ।