महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘शत्रुओंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार! देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंके जो अंश पृथ्वीपर उत्पन्न हुए हैं, वे युद्धमें तुम्हारे द्वारा मारे जाकर अपने कर्मफलके अनुसार यथोचित गति प्राप्त करेंगे ॥ २२-२३ ॥
अक्षया तव कीर्तिश्च लोके स्थास्यति फाल्गुन ।
त्वया साक्षान्महादेवस्तोपितो हि महामृधे ॥ २४ ॥
‘फाल्गुन! संसारमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति स्थापित होगी। तुमने यहाँ महासमरमें साक्षात् महादेवजीको संतुष्ट किया है ॥ २४ ॥
लघ्वी वसुमती चापि कर्तव्या विष्णुना सह ।
गृहाणास्त्रं महाबाहो दण्डमप्रतिवारणम् ।
अनेनास्त्रेण सुमहत् त्वं हि कर्म करिष्यसि ॥ २५ ॥
‘महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णके साथ मिलकर तुम्हें इस पृथ्वीका भार भी हलका करना है, अतः यह मेरा दण्डास्त्र ग्रहण करो। इसका वेग कहीं भी कुण्ठित नहीं होता। इसी अस्त्रके द्वारा तुम बड़े-बड़े कार्य सिद्ध करोगे’ ॥ २५ ॥
वैशम्पायन उवाच
प्रतिजग्राह तत् पार्थो विधिवत् कुरुनन्दनः ।
समन्त्रं सोपचारं च समोक्षविनिवर्तनम् ॥ २६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुरुनन्दन कुन्तीकुमार अर्जुनने विधिपूर्वक मन्त्र, उपचार, प्रयोग और उपसंहारसहित उस अस्त्रको ग्रहण किया ॥ २६ ॥
ततो जलधरश्यामो वरुणो यादसां पतिः ।
पश्चिमां दिशमास्थाय गिरमुच्चारयन् प्रभुः ॥ २७ ॥
इसके बाद जल-जन्तुओंके स्वामी मेघके समान श्यामकान्तिवाले प्रभावशाली वरुण पश्चिम दिशामें खड़े हो इस प्रकार बोले— ॥ २७ ॥
पार्थ क्षत्रियमुख्यस्त्वं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।
पश्य मां पृथुताम्राक्ष वरुणोऽस्मि जलेश्वरः ॥ २८ ॥
‘पार्थ! तुम क्षत्रियोंमें प्रधान एवं क्षत्रिय-धर्ममें स्थित हो। विशाल तथा लाल नेत्रोंवाले अर्जुन! मेरी ओर देखो। मैं जलका स्वामी वरुण हूँ ॥ २८ ॥
मया समुद्यतान् पाशान् वारुणाननिवारितान् ।
प्रतिगृह्णीष्व कौन्तेय सरहस्यनिवर्तनम् ॥ २९ ॥
‘कुन्तीकुमार! मेरे दिये हुए इन वरुण-पाशोंको रहस्य और उपसंहारसहित ग्रहण करो। इनके वेगको कोई भी रोक नहीं सकता ॥ २९ ॥
एभिस्तदा मया वीर संग्रामे तारकामये ।
दैतेयानां सहस्राणि संयतानि महात्मनाम् ॥ ३० ॥