महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणेन क्षीणबाणोऽथ संवृत्तः फाल्गुनस्तदा ।
भीश्चैनमाविशत् तीव्रा तं दृष्ट्वा शरसंक्षयम् ॥ ४५ ॥
उस समय एक ही क्षणमें अर्जुनके सारे बाण समाप्त हो चले। उन बाणोंका इस प्रकार विनाश देखकर उनके मनमें बड़ा भय समा गया ॥ ४५ ॥
चिन्तयामास जिष्णुस्तु भगवन्तं हुताशनम् ।
पुरस्तादक्षयौ दत्तौ तूणौ येनास्य खाण्डवे ॥ ४६ ॥
विजयी अर्जुनने उस समय भगवान् अग्निदेवका चिन्तन किया, जिन्होंने खाण्डववनमें प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें दो अक्षय तूणीर प्रदान किये थे ॥ ४६ ॥
किं नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे बाणाः क्षयं गताः ।
अयं च पुरुषः कोऽपि बाणान् ग्रसति सर्वशः ॥ ४७ ॥
हत्वा चैनं धनुष्कोट्या शूलाग्रेणेव कुञ्जरम् ।
नयामि दण्डधारस्य यमस्य सदनं प्रति ॥ ४८ ॥
वे मन-ही-मन सोचने लगे, ‘मेरे सारे बाण नष्ट हो गये, अब मैं धनुषसे क्या चलाऊँगा। यह कोई अद्भुत पुरुष है, जो मेरे सारे बाणोंको खाये जा रहा है। अच्छा, अब मैं शूलके अग्रभागसे घायल किये जानेवाले हाथीकी भाँति इसे धनुषकी कोटि (नोक)-से मारकर दण्डधारी यमराजके लोकमें पहुँचा देता हूँ’ ॥ ४७-४८ ॥