महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2572, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिया ।। १२ ।।
ततो मित्रेषु सर्वेषु वासुदेवं च भारत ।
प्रेषयामास कौन्तेयो विराटश्च महीपतिः ।। १३ ।।
जनमेजय! तदनन्तर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर तथा राजा विराटने अपने-अपने सम्पूर्ण सुहृदों एवं सगे-सम्बन्धियोंको तथा भगवान् वासुदेवको भी निमन्त्रण भेजा ।। १३ ।।
ततस्त्रयोदशे वर्षे निवृत्ते पञ्च पाण्डवाः ।
उपप्लव्यं विराटस्य समपद्यन्त सर्वशः ।। १४ ।।
पाँचों पाण्डवोंका तेरहवाँ वर्ष तो पूर्ण हो ही चुका था, वे सब-के-सब राजा विराटके उपप्लव्य नामक नगरमें आकर रहने लगे ।। १४ ।।
अभिमन्युं च बीभत्सुरानिनाय जनार्दनम् ।
आनर्तेभ्योऽपि दाशार्हानानयामास पाण्डवः ।। १५ ।।
पाण्डुनन्दन अर्जुनने आनर्तदेशसे अभिमन्यु, भगवान् वासुदेव तथा दशार्हवंशके अपने अन्य सम्बन्धियोंको भी वहाँ बुलवा लिया ।। १५ ।।
काशिराजश्च शैब्यश्च प्रीयमाणौ युधिष्ठिरे ।
अक्षौहिणीभ्यां सहितावागतौ पृथिवीपती ।। १६ ।।
काशिराज और शैब्य दोनों युधिष्ठिरके बड़े प्रेमी थे। वे दोनों नरेश एक-एक अक्षौहिणी सेनाके साथ उपप्लव्य नगरमें आये ।। १६ ।।
अक्षौहिण्या च सहितो यज्ञसेनो महाबलः ।
द्रौपद्याश्च सुता वीराः शिखण्डी चापराजितः ।। १७ ।।
धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्षः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
समस्ताक्षौहिणीपाला यज्वानो भूरिदक्षिणाः ।
वेदावभृथसम्पन्नाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः ।। १८ ।।
महाबली राजा द्रुपद भी एक अक्षौहिणी सेनाके साथ पधारे। उनके साथ द्रौपदीके पाँचों वीर पुत्र, कभी परास्त न होनेवाले शिखण्डी और समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ एवं दुर्धर्ष वीर धृष्टद्युम्न भी थे। इनके सिवा और भी अनेक राजा वहाँ पधारे, जो सब-के-सब एक-एक अक्षौहिणी सेनाके पालक, यज्ञकर्ता, यज्ञोंमें अधिकसे अधिक दक्षिणा देनेवाले, वेद और अवभृथ (यज्ञान्त) स्नानसे सम्पन्न, शूरवीर तथा पाण्डवोंके लिये प्राण देनेवाले थे ।। १७-१८ ।।
तानागतानभिप्रेक्ष्य मत्स्यो धर्मभृतां वरः ।
पूजयामास विधिवत् सभृत्यबलवाहनान् ।। १९ ।।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मत्स्यनरेश विराट्ने उन्हें आया हुआ देख सेवक, सेना और सवारियोंसहित उन सबका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ।। १९ ।।
प्रीतोऽभवद् दुहितरं दत्त्वा तामभिमन्यवे ।