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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2543, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2543

कहाँ गये हैं?' तब घरमें रहनेवाली स्त्रियों और कन्याओंने उनसे सब बातें बनायीं — ॥ ५-६ ॥
अन्तःपुरचराश्चैव कुरुभिर्गोधनं हृतम् ।
विजेतुमभिसंरब्ध एक एवातिसाहसात् ।
बृहन्नलासहायश्च निर्गतः पृथिवीञ्जयः ॥ ७ ॥
'इसी प्रकार अन्तःपुरमें रहनेवाली स्त्रियोंने भी बताया कि कौरवोंने हमारे गोष्ठका गोधन हर लिया है, अतः कुमार भूमिंजय अत्यन्त साहसके कारण क्रोधमें भरकर अकेले ही उन गौओंको जीत लानेके लिये बृहन्नलाके साथ निकले हैं' ॥ ७ ॥
उपयातानतिरथान् भीष्मं शान्तनवं कृपम् ।
कर्णं दुर्योधनं द्रोणं द्रोणपुत्रं च षड् रथान् ॥ ८ ॥
'सुना है, शान्तनुनन्दन भीष्म, कृपाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, द्रोणाचार्य तथा द्रोणपुत्र अश्वत्थामा—ये छः अतिरथी वीर युद्धके लिये आये हैं' ॥ ८ ॥

वैशम्पायन उवाच

राजा विराटोऽथ भृशाभितप्तः
श्रुत्वा सुतं त्वेकरथेन यातम् ।
बृहन्नलासारथिमाजिवर्धनं
प्रोवाच सर्वानथ मन्त्रिमुख्यान् ॥ ९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युद्धमें आगे बढ़नेवाले अपने पुत्रको बृहन्नला सारथिके साथ एकमात्र रथकी सहायतासे कौरवोंका सामना करनेके लिये गया हुआ सुनकर राजा विराटको बड़ा संताप हुआ। उन्होंने (अपने) सभी प्रधान मन्त्रियोंसे कहा— ॥ ९ ॥
सर्वथा कुरवस्ते हि ये चान्ये वसुधाधिपाः ।
त्रिगर्तान् निःसृताञ्छ्रुत्वा न स्थास्यन्ति कदाचन ॥ १० ॥
'कौरव हों या दूसरे कोई राजा, जब वे सुनेंगे कि त्रिगर्त लोग युद्धमें पीठ दिखाकर भाग गये हैं, तब वे कदापि यहाँ ठहर नहीं सकेंगे' ॥ १० ॥
तस्माद् गच्छन्तु मे योधा बलेन महता वृताः ।
उत्तरस्य परीप्सार्थं ये त्रिगर्तैरविक्षताः ॥ ११ ॥
'अतः मेरे सैनिकोंमेंसे जो लोग त्रिगर्तोंके साथ होनेवाले युद्धमें घायल नहीं हुए हों, वे सब विशाल सेनाके साथ राजकुमार उत्तरकी रक्षाके लिये जायँ' ॥
हयांश्च नागांश्च रथांश्च शीघ्रं
पदातिसङ्घांश्च ततः प्रवीरान् ।
प्रस्थापयामास सुतस्य हेतो-