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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2424, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2424

करनेकी इच्छा हो एवं हमारे प्रति इनके हृदयमें केवल द्वेष तथा रोषका भाव ही संचित हो? ।। २६-२७ ।।
आचार्या वै कारुणिकाः प्राज्ञाश्चापापदर्शिनः ।
नैते महाभये प्राप्ते सम्प्रष्टव्याः कथंचन ॥ २८ ॥
‘आचार्यलोग बड़े दयालु, बुद्धिमान् और पाप तथा हिंसाके विरुद्ध विचार रखनेवाले होते हैं। जब कोई महान् भयका अवसर प्राप्त हो, उस समय इनसे किसी प्रकारकी सलाह नहीं पूछनी चाहिये ।। २८ ।।
प्रासादेषु विचित्रेषु गोष्ठीषूपवनेषु च ।
कथा विचित्राः कुर्वाणाः पण्डितास्तत्र शोभनाः ॥ २९ ॥
‘पण्डितलोग सुन्दर महलों और मन्दिरोंमें, सभाओंमें और बगीचोंमें बैठकर जब विचित्र कथावार्ता सुना रहे हों, तब वहीं उनकी शोभा होती है ।। २९ ।।
बहून्याश्चर्यरूपाणि कुर्वाणा जनसंसदि ।
इज्यास्त्रे चोपसंधाने पण्डितास्तत्र शोभनाः ॥ ३० ॥
जनसमुदायमें बहुत-से आश्चर्यजनक विनोदपूर्ण कार्य करने तथा यज्ञ-सम्बन्धी आयुधों (पात्रों) को यथास्थान रखने एवं प्रोक्षण आदि करनेमें ही पण्डितोंकी शोभा है ।। ३० ।।
परेषां विवरज्ञाने मनुष्यचरितेषु च ।
हस्त्यश्वरथचर्यासु खरोष्ट्राजाविकर्मणि ॥ ३१ ॥
गोधनेषु प्रतोलीषु वरद्वारमुखेषु च ।
अन्नसंस्कारदोषेषु पण्डितास्तत्र शोभनाः ॥ ३२ ॥
‘दूसरोंके छिद्रको जानने या देखनेमें, मनुष्योंकी दिनचर्या बतानेमें, हाथी, घोड़े तथा रथयात्रा करनेका मुहूर्त आदिसे निकालनेमें, गदहों, ऊँटों, बकरों और भेड़ोंकी गुण-दोष-समीक्षा एवं चिकित्सा आदिमें गोधनके संग्रह और परीक्षणमें, गलियों तथा घरके श्रेष्ठ दरवाजोंपर किये जानेवाले मांगलिक कृत्योंमें, नवीन अन्नका इष्टिद्वारा संस्कार कराने तथा अन्नमें केश-कीट आदि गिर जानेसे जो दोष आता है, उनपर विचार करनेमें भी पण्डितोंकी राय लेनी चाहिये। ऐसे ही कार्योंमें उनकी शोभा है ।। ३१-३२ ।।
पण्डितान् पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः ।
विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्यो भवेत् परः ॥ ३३ ॥
‘शत्रुओंके गुणोंका बखान करनेवाले पण्डितोंको पीछे करके ऐसी नीति काममें लें, जिससे शत्रु‌का वध हो सके ।। ३३ ।।
गावश्च सम्प्रतिष्ठाप्य सेनां व्यूह्य समन्ततः ।
आरक्षाश्च विधीयन्तां यत्र योत्स्यामहे परान् ॥ ३४ ॥
‘गौओंको बीचमें खड़ी करके उनके चारों ओर सेनाका व्यूह बना लिया जाय तथा सब ओरसे रक्षाकी ऐसी व्यवस्था कर ली जाय, जिससे हम शत्रुओंके साथ युद्ध कर