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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2382, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2382

'विराटके सूने नगरमें उनका एक ही पुत्र देख-रेखके लिये रह गया था; सो यह बचपन (मूर्खता) के कारण हमारा सामना करनेके लिये चला आया, अपने पुरुषार्थसे प्रेरित होकर नहीं ।। ३६ ।।
सत्रेण नूनं छन्नं हि चरन्तं पार्थमर्जुनम् ।
उत्तरः सारथिं कृत्वा निर्यातो नगराद् बहिः ।। ३७ ।।
'निश्चय ही कपटवेशमें छिपे हुए कुन्तीपुत्र अर्जुनको अपना सारथि बनाकर उत्तर नगरसे बाहर निकला था ।। ३७ ।।
स नो मन्यामहे दृष्ट्वा भीत एष पलायते ।
तं नूनमेष धावन्तं जिघृक्षति धनंजयः ।। ३८ ।।
'मालूम होता है, हमलोगोंको देखकर यह बहुत डर गया है; इसीलिये भागा जाता है और ये अर्जुन अवश्य ही उस भागते हुए राजकुमारको पकड़ लाना चाहते हैं' ।। ३८ ।।

वैशम्पायन उवाच

इति स्म कुरवः सर्वे विमृशन्तः पृथक् पृथक् ।
न च व्यवसितुं किंचिदुत्तरं शक्नुवन्ति ते ।। ३९ ।।
छन्नं तथा तं सत्रेण पाण्डवं प्रेक्ष्य भारत ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! इस प्रकार सभी कौरव अलग-अलग विचार-विमर्श करते थे, किंतु छद्मवेशमें छिपे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन तथा उत्तरको देखकर भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच पाते थे ।।
(दुर्योधन उवाचेदं सैनिकान् रथसत्तमान् ।।
अर्जुनो वासुदेवो वा रामः प्रद्युम्न एव वा ।
ते हि नः प्रतिसंधातुं संग्रामे न च शक्नुयुः ।।
अन्यो वा क्लीबरूपेण यद्यागच्छेद् गवां पदम् ।
अर्पयित्वा शरैस्तीक्ष्णैः पातयिष्यामि भूतले ।।
कथमेकतरस्तेषां समस्तान् योधयेत् कुरून् ।
अर्जुनो नेति चेत्येनं न व्यवस्यन्ति ते पुनः ।
इति स्म कुरवः सर्वे मन्त्रयन्तो महारथाः ।।
दृढवेधी महासत्त्वः शक्रतुल्यपराक्रमः ।
अद्यागच्छति ये योद्धुं सर्वं संशयितं बलम् ।।
न चाप्यन्यं नरं तत्र व्यवस्यन्ति धनंजयात् ।)
उस समय दुर्योधनने रथियोंमें श्रेष्ठ समस्त सैनिकोंसे इस प्रकार कहा—'अर्जुन, श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न भी संग्रामभूमिमें हमलोगोंका सामना नहीं कर सकते। यदि कोई दूसरा मनुष्य ही हीजड़ेका रूप धारण करके इन गौओंके स्थानपर आयेगा, तो मैं उसे