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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2264, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2264

अपने बड़े भाईका पुजारी और वीर है। पाञ्चालराजकुमारी! तुम इसे अपने हाथों भोजन कराना॥ ३८—४०॥
तं दृष्ट्वा व्यापृतं गोषु वत्सचर्मक्षपाशयम्।
सहदेवं युधां श्रेष्ठं किं नु जीवामि पाण्डव ॥ ४१ ॥
पाण्डुनन्दन! योद्धाओंमें श्रेष्ठ उसी सहदेवको जब मैं गौओंकी सेवामें तत्पर और बछड़ोंके चमड़ेपर रातमें सोते देखती हूँ, तब किसलिये जीवन धारण करूँ?॥ ४१॥
यस्त्रिभिर्नित्यसम्पन्नो रूपेणास्त्रेण मेधया।
सोऽश्वबन्धो विराटस्य पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ ४२ ॥
इसी प्रकार जो सुन्दर रूप, अस्त्रबल और मेधाशक्ति—इन तीनोंसे सदा सम्पन्न रहता है, वह वीरवर नकुल आज विराटके यहाँ घोड़े बाँधता है। देखो, कालकी कैसी विपरीत गति है?॥ ४२॥
अभ्यकीर्यन्त वृन्दानि दामग्रन्थिमुदीक्ष्य तम्।
विनयन्तं जवेनाश्वान् महाराजस्य पश्यतः ॥ ४३ ॥
जिसे देखकर शत्रुओंके समुदाय बिखर जाते—भाग खड़े होते हैं, वही अब ग्रन्थिक बनकर घोड़ोंकी रास खोलता और बाँधता है तथा महाराजके सामने अश्वोंको वेगसे चलनेकी शिक्षा देता है॥ ४३॥
अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम्।
विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शयन्तं च वाजिनः ॥ ४४ ॥
मैंने शोभासम्पन्न, तेजस्वी तथा उत्तम रूपवाले नकुलको अपनी आँखों देखा है। वह मत्स्यनरेश विराटको भाँति-भाँतिके घोड़े दिखाता और उनकी सेवामें खड़ा रहता है॥ ४४॥
किं नु मां मन्यसे पार्थ सुखिनीति परंतप।
एवं दुःखशताविष्टा युधिष्ठिरनिमित्ततः ॥ ४५ ॥
कुन्तीनन्दन! शत्रुदमन! क्या तुम समझते हो, यह सब देखकर मैं सुखी हूँ। राजा युधिष्ठिरके कारण ऐसे सैकड़ों दुःख मुझे सदा घेरे रहते हैं॥ ४५॥
अतः प्रतिविशिष्टानि दुःखान्यन्यानि भारत।
वर्तन्ते मयि कौन्तेय वक्ष्यामि शृणु तान्यपि ॥ ४६ ॥
भारत! कुन्तीकुमार! इनसे भी भारी दूसरे दुःख मुझपर आ पड़े हैं, उनका भी वर्णन करती हूँ, सुनो॥
युष्मासु ध्रियमाणेषु दुःखानि विविधान्युत।
शोषयन्ति शरीरं मे किं नु दुःखमतः परम् ॥ ४७ ॥
तुम सबके जीते-जी नाना प्रकारके कष्ट मेरे शरीरको सुखा रहे हैं, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?॥ ४७॥