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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2248, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2248

तत् कर्म कृतवानद्य कथं निद्रां निषेवसे ।
वहाँ पहुँचते ही सैरन्ध्री बोली—आर्यपुत्र! मुझसे द्वेष रखनेवाले उस महापापी सेनापतिके, जिसने मेरे साथ वैसा अपमानजनक बर्ताव किया था, जीते-जी तुम आज नींद कैसे ले रहे हो? ।। ७ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वाथ तां शालां प्रविवेश मनस्विनी ।। ८ ।।
यस्यां भीमस्तथा शेते मृगराज इव श्वसन् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ऐसा कहती हुई मनस्विनी द्रौपदीने उस भवनमें प्रवेश किया, जिसमें सिंहकी भाँति साँसें खींचते हुए भीमसेन सो रहे थे ।।
तस्या रूपेण सा शाला भीमस्य च महात्मनः ।। ९ ।।
सम्मूर्च्छितेव कौरव्य प्रजज्वाल च तेजसा ।
सा वै महानसं प्राप्य भीमसेनं शुचिस्मिता ।। १० ।।
सर्वश्वेतेव माहेयी वने जाता त्रिहायणी ।
उपातिष्ठत पाञ्चाली वासितेव नरर्षभम् ।। ११ ।।
कुरुनन्दन! द्रौपदीके दिव्य रूपसे महात्मा भीमकी वह पाकशाला शोभा-समृद्धिको प्राप्त होकर तेजसे प्रकाशित हो उठी। पवित्र मुसकानवाली द्रौपदी पाक-शालामें पहुँचकर क्रमशः [बक, साँड़ और गजराजके पास जानेवाली] जलमें उत्पन्न हुई बकी, तीन सालकी पार्थिव गौ तथा हथिनीके समान श्रेष्ठ पुरुष भीमसेनके समीप गयीं ।। ९—११ ।।
सा लतेव महाशालं फुल्लं गोमतीतीरजम् ।
परिष्वजत पाञ्चाली मध्यमं पाण्डुनन्दनम् ।। १२ ।।
जैसे लता गोमतीके तटपर उत्पन्न एवं खिले हुए ऊँचे शालवृक्षमें लिपट जाती है, उसी प्रकार सती-साध्वी पांचालीने मध्यम* पाण्डव भीमसेनका आलिंगन किया ।। १२ ।।
बाहुभ्यां परिरभ्यैनं प्राबोधयदनिन्दिता ।
सिंहं सुप्तं वने दुर्गे मृगराजवधूरिव ।। १३ ।।
उसने उन्हें दोनों भुजाओंसे कसकर जगाया; ठीक वैसे ही, जैसे दुर्गम वनमें सोये हुए सिंहको सिंहिनी जगाती है ।। १३ ।।
भीमसेनमुपाश्लिष्यद्धस्तिनीव महागजम् ।
वीणेव मधुरालापा गान्धारं साधु मूर्छती ।
अभ्यभाषत पाञ्चाली भीमसेनमनिन्दिता ।। १४ ।।
जैसे हथिनी महान् गजराजका आलिंगन करती है, उसी प्रकार निर्दोष पाञ्चालराजकुमारी भीमसेनसे सटकर गान्धार स्वरमें मधुर ध्वनि फैलाती हुई वीणाकी भाँति मीठे वचनोंमें बोली— ।। १४ ।।