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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2244, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2244

हैं। वही आगे चलकर महाराज विराटकी प्यारी पटरानी हुई।
तां विराटस्य मत्स्यस्य केकयः प्रददौ मुदा ।
सुरथायां मृतायां तु कौसल्यां श्वेतमातरि ॥
विराटकी बड़ी रानी कोसलदेशकी राजकुमारी सुरथा, जो श्वेतकी जननी थी, उसकी मृत्यु हो जानेपर केकय-नरेशने अपनी कन्या सुदेष्णाका विवाह मत्स्यराज विराटके साथ प्रसन्नतापूर्वक कर दिया।
सुदेष्णां महिषीं लब्ध्वा राजा दुःखमपानुदत् ॥
उत्तरं चोत्तरां चैव विराटात् पृथिवीपते ।
सुदेष्णा सुषुवे देवी कैकेयी कुलवृद्धये ॥
सुदेष्णाको महारानीके रूपमें पाकर राजा विराटका दुःख दूर हो गया। जनमेजय! केकयकुमारी रानी सुदेष्णाने राजा विराटसे अपने कुलकी वृद्धिके लिये उत्तर और उत्तरा नामक दो संतानोंको उत्पन्न किया।
मातृष्वसृसुतां राजन् कीचकस्तामनिन्दिताम् ।
सदा परिचरन् प्रीत्या विराटे न्यवसत् सुखी ॥
राजन्! कीचक अपनी मौसीकी बेटी सती-साध्वी सुदेष्णाकी प्रेमपूर्वक परिचर्या करता हुआ विराटके यहाँ सुखपूर्वक रहने लगा।
भ्रातरस्तस्य विक्रान्ताः सर्वे च तमनुव्रताः ।
विराटस्यैव संहृष्टा बलं कोशं च वर्धयन् ॥
उसके सभी पराक्रमी भाई कीचकके ही प्रेमी भक्त थे; अतः वे भी विराटके ही बल और कोषको बढ़ाते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँ रहने लगे।
कालेया नाम दैतेयाः प्रायशो भुवि विश्रुताः ।
जज्ञिरे कीचका राजन् बाणो ज्येष्ठस्ततोऽभवत् ॥
स हि सर्वास्त्रसम्पन्नो बलवान् भीमविक्रमः ।
कीचको नष्टमर्यादो बभूव भयदो नृणाम् ।
राजन्! कालेय नामक दैत्य ही, जो प्रायः इस भूमण्डलमें विख्यात थे, कीचकोंके रूपमें उत्पन्न हुए थे। कालेयोंमें बाण सबसे बड़ा था। वही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न, भयंकर पराक्रमी और महाबली कीचक हुआ, जो धर्मकी मर्यादाको तोड़ने और मनुष्योंके भयको बढ़ानेवाला था।
तं प्राप्य बलसम्मतं विराटः पृथिवीपतिः ॥
जिगाय सर्वांश्च रिपून् यथेन्द्रो दानवानिव ।
उस बलोन्मत्त कीचककी सहायता पाकर जैसे इन्द्र दानवोंपर विजय पाते हैं, उसी प्रकार राजा विराटने भी समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त की।
मेखलांश्च त्रिगर्तांश्च दशार्णांश्च कशेरुकान् ।