महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयोऽसौ त्वां कामसम्मत्तो दुर्लभामवमन्यते ।। ५० ।।
**सुदेष्णाने कहा—**सुन्दर लटोंवाली सुन्दरी! यदि तुम्हारी सम्मति हो, तो मैं कीचकको मरवा डालूँ; जो कामसे उन्मत्त होकर तुझ-जैसी दुर्लभ देवीका अपमान कर रहा है ।। ५० ।।
सैरन्ध्र्युवाच
अन्ये चैनं वधिष्यन्ति येषामागः करोति सः ।
मन्ये चैवाद्य सुव्यक्तं यमलोकं गमिष्यति ।। ५१ ।।
**सैरन्ध्री बोली—**महारानी! उसे दूसरे ही लोग मार डालेंगे, जिनका कि अपराध वह कर रहा है। मैं तो समझती हूँ, अब वह निश्चय ही यमलोककी यात्रा करेगा ।। ५१ ।।
(भ्रातुः प्रयच्छ त्वरिता जीवश्राद्धं त्वमद्य वै ।
सुदृष्टं कुरु वै चैनं नासून् मन्ये धरिष्यति ।।
रानी! आज तुम अपने भाईके लिये शीघ्र ही जीवित श्राद्ध कर लो। उसके लिये आवश्यक दान दे लो। साथ ही उसे आँख भरकर अच्छी तरह देख लो। मेरा विश्वास है कि अब उसके प्राण नहीं रहेंगे।
तेषां हि मम भर्तॄणां पञ्चानां धर्मचारिणाम् ।
एको दुर्धर्षणोऽत्यर्थं बले चाप्रतिमो भुवि ।।
निर्मनुष्यमिमं लोकं कुर्यात् क्रुद्धो निशामिमाम् ।
न च संक्रुध्यते तावद् गन्धर्वः कामरूपधृक् ।।
मेरे पाँच धर्मात्मा पतियोंमेंसे एक अत्यन्त दुःसह एवं अमर्षशील वीर हैं। भूतलपर बलमें उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। वे कुपित होनेपर इस रातमें ही इस संसारको मनुष्योंसे शून्य कर सकते हैं। परंतु इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे गन्धर्व न जाने क्यों अभीतक क्रोध नहीं कर रहे हैं।
वैशम्पायन उवाच
सुदेष्णामेवमुक्त्वा तु सैरन्ध्री दुःखमोहिता ।
कीचकस्य वधार्थाय व्रतदीक्षामुपागमत् ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! रानी सुदेष्णासे ऐसा कहकर दुःखसे मोहित हुई सैरन्ध्रीने कीचकके वधके लिये व्रतकी दीक्षा ग्रहण की।
अभ्यर्थिता च नारीभिर्मानिता च सुदेष्णया ।
न च स्नाति न चाश्नाति न पांसून् परिमार्जति ।।
दूसरी स्त्रियोंने उससे बहुत प्रार्थना की। रानी सुदेष्णाने भी उसे बहुत मनाया; तथापि न वह स्नान करती, न भोजन करती और न अपने शरीरकी धूल ही झाड़ती थी।
रुधिरक्लिन्नवदना बभूव रुदितेक्षणा ।।