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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2072, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2072

कर्ण उवाच

संशयं परमं प्राप्य विमोक्ष्ये वासवीमिमाम् ।
यथा मामात्थ शक्र त्वं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ३४ ।।
कर्ण बोला—देवेन्द्र! आप जैसा मुझसे कह रहे हैं, उसके अनुसार प्राणसंकटकी अवस्थामें पड़कर ही मैं आपकी दी हुई इस शक्तिका उपयोग करूँगा, यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ।। ३४ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततः शक्तिं प्रज्वलितां प्रतिगृह्य विशाम्पते ।
शस्त्रं गृहीत्वा निशितं सर्वगात्राण्यकृन्तत ।। ३५ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर इन्द्रकी प्रज्वलित शक्ति लेकर कर्णने तीखी तलवार उठायी और कवच उधेड़नेके लिये अपने सब अंगोंको काटना आरम्भ किया ।। ३५ ।।

ततो देवा मानवा दानवाश्च
निकृन्तन्तं कर्णमात्मानमेवम् ।
दृष्ट्वा सर्वे सिंहनादान् प्रणेदु-
र्न ह्यस्यासीन्मुखजो वै विकारः ।। ३६ ।।
उस समय देवता, मनुष्य और दानव सब लोग इस प्रकार अपना शरीर काटते हुए कर्णको देखकर सिंहनाद करने लगे; परंतु कर्णके मुखपर तनिक भी विकार नहीं आया ।। ३६ ।।

ततो दिव्या दुन्दुभयः प्रणेदुः
पपातोच्चैः पुष्पवर्षं च दिव्यम् ।
दृष्ट्वा कर्णं शस्त्रसंकृत्तगात्रं
मुहुश्चापि स्मयमानं नृवीरम् ।। ३७ ।।
कर्णके सारे अंग शस्त्रोंके आघातसे कट गये थे, फिर भी वह नरवीर बारंबार मुसकरा रहा था। यह देखकर दिव्य दुन्दुभियाँ बज उठीं एवं आकाशसे दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगी ।। ३७ ।।

ततश्छित्त्वा कवचं दिव्यमङ्गात्
तथैवार्द्रं प्रददौ वासवाय ।
तथोत्कृत्य प्रददौ कुण्डले ते
कर्णात् तस्मात् कर्मणा तेन कर्णः ।। ३८ ।।
तदनन्तर अपने शरीरसे दिव्य कवचको उधेड़कर कर्णने इन्द्रके हाथमें दे दिया; वह कवच उस समय रक्तसे भीगा हुआ ही था। इसी प्रकार उसने कानोंके वे कुण्डल भी

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