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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2059, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2059

उस बालकके पैदा होते ही भामिनी कुन्तीने धायसे सलाह लेकर एक पिटारी मँगवायी और उसमें सब ओर सुन्दर मुलायम बिछौने बिछा दिये। इसके बाद उस पिटारीमें चारों ओर मोम चुपड़ दिया, जिससे उसके भीतर जल न प्रवेश कर सके। जब वह सब तरहसे चिकनी और सुखद हो गयी, तब उसके भीतर उस बालकको सुला दिया और उसका सुन्दर ढक्कन बंद कर दिया तथा रोते-रोते उस पिटारीको अश्वनदीमें छोड़ दिया* ॥ ६-७ ॥
जानती चाप्यकर्तव्यं कन्याया गर्भधारणम् ।
पुत्रस्नेहेन सा राजन् करुणं पर्यदेवयत् ॥ ८ ॥
राजन्! यद्यपि वह यह जानती थी कि किसी कन्याके लिये गर्भधारण करना सर्वथा निषिद्ध और अनुचित है, तथापि पुत्रस्नेह उमड़ आनेसे कुन्ती वहाँ करुणाजनक विलाप करने लगी ॥ ८ ॥
समुत्सृजन्ती मञ्जूषामश्वनद्यां तदा जले ।
उवाच रुदती कुन्ती यानि वाक्यानि तच्छृणु ॥ ९ ॥
उस समय अश्वनदीके जलमें उस पिटारीको छोड़ते समय रोती हुई कुन्तीने जो बातें कहीं, उन्हें बताता हूँ; सुनो ॥ ९ ॥
स्वस्ति ते चान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च पुत्रक ।
दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यस्तथा तोयचराश्च ये ॥ १० ॥
वह बोली—'मेरे बच्चे! जलचर, थलचर, आकाशचारी तथा दिव्य प्राणी तेरा मंगल करें ॥ १० ॥
शिवास्ते सन्तु पन्थानो मा च ते परिपन्थिनः ।
आगताश्च तथा पुत्र भवन्त्वद्रोहचेतसः ॥ ११ ॥
'तेरा मार्ग मंगलमय हो। बेटा! तेरे पास शत्रु न आयें। जो आ जायँ, उनके मनमें तेरे प्रति द्रोहकी भावना न रहे ॥ ११ ॥
पातु त्वां वरुणो राजा सलिले सलिलेश्वरः ।
अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षस्थः पवनः सर्वगस्तथा ॥ १२ ॥
'जलमें उसके स्वामी राजा वरुण तेरी रक्षा करें। अन्तरिक्षमें वहाँ रहनेवाले सर्वगामी वायुदेव तेरी रक्षा करें ॥ १२ ॥
पिता त्वां पातु सर्वत्र तपनस्तपतां वरः ।
येन दत्तोऽसि मे पुत्र दिव्येन विधिना किल ॥ १३ ॥
'पुत्र! जिन्होंने दिव्य रीतिसे तुझे मेरे गर्भमें स्थापित किया है वे तपनेवालोंमें श्रेष्ठ तेरे पिता भगवान् सूर्य सर्वत्र तेरा पालन करें ॥ १३ ॥
आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वे च देवताः ।
मरुतश्च सहेन्द्रेण दिशश्च सदिगीश्वराः ॥ १४ ॥
रक्षन्तु त्वां सुराः सर्वे समेषु विषमेषु च ।