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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2024, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2024

को मामेवं भवान् प्राह दर्शयन् सौहृदं परम् ।
कामया भगवन् ब्रूहि को भवान् द्विजवेषधृक् ॥ २१ ॥
कर्णने पूछा—भगवन्! आप मेरे प्रति अत्यन्त स्नेह दिखाते हुए जो इस प्रकार हितकर सलाह दे रहे हैं इससे मैं जानना चाहता हूँ कि आप कौन हैं? यदि इच्छा हो, तो बताइये। इस प्रकार ब्राह्मणवेष धारण करनेवाले आप कौन हैं? ॥ २१ ॥

ब्राह्मण उवाच

अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात् त्वां निदर्शये ।
कुरुष्वैतद् वचो मे त्वमेतच्छ्रेयः परं हि ते ॥ २२ ॥
ब्राह्मणने कहा—तात! मैं सहस्रांशु सूर्य हूँ। स्नेहवश ही तुम्हें दर्शन देकर सामयिक कर्तव्य सुझा रहा हूँ। तुम मेरा कहना मान लो। इससे तुम्हारा परम कल्याण होगा ॥ २२ ॥

कर्ण उवाच

श्रेय एव ममात्यन्तं यस्य मे गोपतिः प्रभुः ।
प्रवक्ताद्य हितान्वेषी शृणु चेदं वचो मम ॥ २३ ॥
कर्णने कहा—जिसके हितका अनुसंधान साक्षात् भगवान् सूर्य करते और हितकी बात बताते हैं, उस कर्णका तो परम कल्याण है ही। भगवन्! आप मेरी यह बात सुनें ॥ २३ ॥

प्रसादये त्वां वरदं प्रणयाच्च ब्रवीम्यहम् ।
न निवार्यो व्रतादस्मादहं यद्यस्मि ते प्रियः ॥ २४ ॥
प्रभो! आप वरदायक देवता हैं। मैं आपसे प्रसन्न रहनेका अनुरोध करता हूँ और प्रेमपूर्वक यह कहता हूँ कि यदि मैं आपका प्रिय हूँ तो आप मुझे इस व्रतसे विचलित न करें ॥ २४ ॥

व्रतं वै मम लोकोऽयं वेत्ति कृत्स्नं विभावसो ।
यथाहं द्विजमुख्येभ्यो दद्यां प्राणानपि ध्रुवम् ॥ २५ ॥
सूर्यदेव! संसारमें सब लोग मेरे इस व्रतके विषयमें पूर्णरूपसे जानते हैं कि मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके याचना करनेपर उन्हें निश्चय ही अपने प्राण भी दे सकता हूँ ॥ २५ ॥

यद्यागच्छति मां शक्रो ब्राह्मणच्छद्मना वृतः ।
हितार्थं पाण्डुपुत्राणां खेचरोत्तम भिक्षितुम् ॥ २६ ॥
दास्यामि विबुधश्रेष्ठ कुण्डले वर्म चोत्तमम् ।
न मे कीर्तिः प्रणश्येत त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ २७ ॥
आकाशमें विचरनेवालोंमें उत्तम सूर्यदेव! यदि पाण्डवोंके हितके लिये ब्राह्मणके छद्मवेशमें अपनेको छिपाकर साक्षात् इन्द्रदेव मेरे पास भिक्षा माँगने आ रहे हैं तो देवेश्वर! मैं