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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1994, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1994

सावित्र्युवाच

न दूरमेतन्मम भर्तृसंनिधौ
मनो हि मे दूरतरं प्रधावति ।
अथ व्रजन्नेव गिरं समुद्यतां
मयोच्यमानां शृणु भूय एव च ॥ ४० ॥
**सावित्रीने कहा—**भगवन्! मैं अपने स्वामीके समीप हूँ। इसलिये यह स्थान मेरे लिये दूर नहीं है। मेरा मन तो और भी दूरतक दौड़ लगाता है। आप चलते-चलते ही मेरी कही हुई ये प्रस्तुत बातें पुनः सुनें ॥ ४० ॥
विवस्वतस्त्वं तनयः प्रतापवां-
स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुधैः ।
समेन धर्मेण चरन्ति ताः प्रजा-
स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता ॥ ४१ ॥
देवेश्वर! आप विवस्वान् (सूर्य)-के प्रतापी पुत्र हैं; इसलिये विद्वान् पुरुष आपको वैवस्वत कहते हैं। आप समस्त प्रजाके साथ समतापूर्वक धर्मानुसार आचरण करते हैं, इसलिये आप धर्मराज कहलाते हैं ॥ ४१ ॥
आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः ।
तस्मात् सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति ॥ ४२ ॥
मनुष्यको अपने-आपपर भी उतना विश्वास नहीं होता है, जितना संतोंपर होता है। इसलिये सब लोग संतोंसे विशेष प्रेम करना चाहते हैं ॥ ४२ ॥
सौहृदात् सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते ।
तस्मात् सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ॥ ४३ ॥
सौहार्दसे ही समस्त प्राणियोंका एक-दूसरेके प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। संतोंमें सौहार्द होनेके कारण ही सब लोग उनपर अधिक विश्वास करते हैं ॥ ४३ ॥

यम उवाच

उदाहृतं ते वचनं यदङ्गने
शुभे न तादृक् त्वदृते श्रुतं मया ।
अनेन तुष्टोऽस्मि विनास्य जीवितं
वरं चतुर्थं वरयस्व गच्छ च ॥ ४४ ॥
**यमराज बोले—**कल्याणि! तूने जैसी बात कही है, वैसी मैंने तेरे सिवा किसी दूसरेके मुखसे नहीं सुनी है। शुभे! तेरी इस बातसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; तू सत्यवान्के जीवनके सिवा और कोई चौथा वर माँग ले और यहाँसे लौट जा ॥ ४४ ॥

सावित्र्युवाच