महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वाध्यायिनो भिक्षवश्च तथैव वनवासिनः ॥ १४ ॥
बहवो ब्राह्मणास्तत्र परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् ।
तपःसिद्धा महात्मानः शतशः संशितव्रताः ॥ १५ ॥
वहाँ बहुत-से अग्निहोत्री ब्राह्मणों, निरग्निकों, स्वाध्यायपरायण ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थियों, संन्यासियों, सैकड़ों कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपःसिद्ध महात्माओं तथा अन्य अनेक ब्राह्मणोंने महाराज युधिष्ठिरको घेर लिया ॥ १४-१५ ॥
ते यात्वा पाण्डवास्तत्र ब्राह्मणैर्बहुभिः सह ।
पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुर्भरतर्षभाः ॥ १६ ॥
वहाँ पहुँचकर भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंने बहुत-से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र एवं रमणीय द्वैतवनमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥
तमालतालाम्रमधूकनीप-
कदम्बसर्जार्जुनकर्णिकारैः ।
तपात्यये पुष्पधरैरुपेतं
महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १७ ॥
राष्ट्रपति युधिष्ठिरने देखा, वह महान् वन तमाल, ताल, आम, महुआ, नीप, कदम्ब, साल, अर्जुन और कनेर आदि वृक्षोंसे, जो ग्रीष्म-ऋतु बीतनेपर फूल धारण करते हैं, सम्पन्न है ॥ १७ ॥
महाद्रुमाणां शिखरेषु तस्थु-
र्मनोरमां वाचमुदीरयन्तः ।
मयूरदात्यूहचकोरसङ्घा-
स्तस्मिन् वने बर्हिणकोकिलाश्च ॥ १८ ॥
उस वनमें बड़े-बड़े वृक्षोंकी ऊँची शाखाओं-पर मयूर, चातक, चकोर, बर्हिण तथा कोकिल आदि पक्षी मनको भानेवाली मीठी बोली बोलते हुए बैठे थे ॥ १८ ॥
करेणुयूथैः सह यूथपानां
मदोत्कटानामचलप्रभाणाम् ।
महान्ति यूथानि महाद्विपानां
तस्मिन् वने राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १९ ॥
राष्ट्रपति युधिष्ठिरको उस वनमें पर्वतोंके समान प्रतीत होनेवाले मदोन्मत्त गजराजोंके, जो एक-एक यूथके अधिपति थे, हथिनियोंके साथ विचरनेवाले कितने ही भारी-भारी झुंड दिखायी दिये ॥ १९ ॥
मनोरमां भोगवतीमुपेत्य
पूतात्मनां चीरजटाधराणाम् ।
तस्मिन् वने धर्मभृतां निवासे