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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1722, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1722

ततो युधिष्ठिरो राजा तच्छ्रुत्वा दूतभाषितम् ॥ १२ ॥
अब्रवीन्नृपशार्दूलो दिष्ट्या राजा सुयोधनः ।
यजते क्रतुमुख्येन पूर्वेषां कीर्तिवर्धनः ॥ १३ ॥
दूतका यह कथन सुनकर राजाओंमें सिंहके समान महाराज युधिष्ठिरने इस प्रकार उत्तर दिया—‘सौभाग्यकी बात है कि पूर्वजोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजा सुयोधन श्रेष्ठ यज्ञके द्वारा भगवान्‌का यजन कर रहे हैं ॥ १२-१३ ॥
वयमध्युपयास्यामो न त्विदानीं कथंचन ।
समयः परिपाल्यो नो यावद् वर्षं त्रयोदशम् ॥ १४ ॥
‘हम भी उस यज्ञमें चलते, परंतु इस समय यह किसी तरह सम्भव नहीं है। हमें तेरह वर्षतक वनमें रहनेकी अपनी प्रतिज्ञाका पालन करना है' ॥ १४ ॥
श्रुत्वैतद् धर्मराजस्य भीमो वचनमब्रवीत् ।
तदा तु नृपतिर्गन्ता धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥
अस्त्रशस्त्रप्रदीप्तेऽग्नौ यदा तं पातयिष्यति ।
वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं रणसत्रे नराधिपः ॥ १६ ॥
यदा क्रोधहविर्मोक्ता धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः ।
आगन्ताहं तदास्मीति वाच्यस्ते स सुयोधनः ॥ १७ ॥