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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 171

अप्रमादः सदा कार्यो नगरे यादवर्षभाः ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मैं नगरनिवासियोंको आश्वासन देकर राजा उग्रसेन, पिता वसुदेव तथा सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंका हर्ष बढ़ाते हुए बोला—'यदुकुलके श्रेष्ठ पुरुषो! आपलोग नगरकी रक्षाके लिये सदा सावधान रहें' ॥ ७-८ ॥
शाल्वराजविनाशाय प्रयातं मां निबोधत ।
नाहत्वा तं निवर्तिष्ये पुरीं द्वारवतीं प्रति ॥ ९ ॥
'मैं शाल्वराजका नाश करनेके लिये यहाँसे प्रस्थान करता हूँ। आप यह निश्चय जानें; मैं शाल्वका वध किये बिना द्वारकापुरीको नहीं लौटूँगा' ॥ ९ ॥
सशाल्वं सौभनगरं हत्वा द्रष्टास्मि वः पुनः ।
त्रिःसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीषणा ॥ १० ॥
'शाल्वसहित सौभनगरका नाश कर लेनेपर ही मैं पुनः आपलोगोंका दर्शन करूँगा। अब शत्रुओंको भयभीत करनेवाले इस नगाड़ेको तीन बार बजाइये' ॥ १० ॥
ते मयाऽऽश्वासिता वीरा यथावद् भरतर्षभ ।
सर्वे मामब्रुवन् हृष्टाः प्रयाहि जहि शात्रवान् ॥ ११ ॥
भरतकुलभूषण! मेरे इस प्रकार आश्वासन देनेपर सभी यदुवंशी वीरोंने प्रसन्न होकर मुझसे कहा—'जाइये और शत्रुओंका विनाश कीजिये' ॥ ११ ॥
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितः ।
वाचयित्वा द्विजश्रेष्ठान् प्रणम्य शिरसाभवम् ॥ १२ ॥
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनानादयन् दिशः ।
प्रध्माय शङ्खप्रवरं पाञ्चजन्यमहं नृप ॥ १३ ॥
प्रयातोऽस्मि नरव्याघ्र बलेन महता वृतः ।
क्लृप्तेन चतुरङ्गेन यत्तेन जितकाशिना ॥ १४ ॥
प्रसन्नचित्तवाले उन वीरोंके द्वारा आशीर्वादसे अभिनन्दित होकर मैंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और मस्तक झुकाकर भगवान् शिवको प्रणाम किया। नरश्रेष्ठ! तदनन्तर शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए अपने रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए श्रेष्ठ शंख पांचजन्यको बजाकर मैंने विशाल सेनाके साथ रणके लिये प्रस्थान किया। मेरी उस व्यूहरचनासे युक्त और नियन्त्रित सेनामें हाथी, घोड़े, रथी और पैदल—चारों ही अंग मौजूद थे। उस समय वह सेना विजयसे सुशोभित हो रही थी ॥ १२—१४ ॥
समतीत्य बहून् देशान् गिरींश्च बहुपादपान् ।
सरांसि सरितश्चैव मार्तिकावतमासदम् ॥ १५ ॥
तब मैं बहुत-से देशों और असंख्य वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतों, सरोवरों और सरिताओंको लाँघता हुआ मार्तिकावतमें जा पहुँचा ॥ १५ ॥