महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1680, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंपराभवो मा भविष्यत् कुरुदारेषु सर्वशः ।
'आपलोगोंका कल्याण हो। रानियोंसहित महाराजको छुड़ाइये। कहीं ऐसा न हो कि कुरुकुलकी स्त्रियोंका तिरस्कार हो जाय' ॥ ७ १/२ ॥
एवमुक्ते तु धर्मात्मा ज्येष्ठः पाण्डुसुतस्तदा ॥ ८ ॥
प्रसाद्य पाण्डवान् सर्वान्राज्ञापयत मोक्षणे ।
उनके ऐसा कहनेपर ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिरने अन्य सब पाण्डवोंको राजी करके हम सब लोगोंको छुड़ानेके लिये आज्ञा दी ॥ ८ १/२ ॥
अथागम्य तमुद्देशं पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ॥ ९ ॥
सान्त्वपूर्वमयाचन्त शक्ताः सन्तो महारथाः ।
तदनन्तर पुरुषसिंह महारथी पाण्डव उस स्थानपर आकर समर्थ होते हुए भी गन्धर्वोंसे सान्त्वनापूर्ण शब्दोंमें (हमें छोड़ देनेके लिये) याचना करने लगे ॥ ९ १/२ ॥
यदा चास्मान् न मुमुचुर्गन्धर्वाः सान्त्विता अपि ॥ १० ॥
(आकाशचारिणो वीरा नदन्तो जलदा इव) ।
ततोऽर्जुनश्च भीमश्च यमौ च बलोत्कटौ ।
मुमुचुः शरवर्षाणि गन्धर्वान् प्रत्यनेकशः ॥ ११ ॥
उनके समझाने-बुझानेपर भी जब आकाशचारी वीर गन्धर्व हमें न छोड़ सके और बादलोंकी भाँति गर्जने लगे तब अर्जुन, भीम तथा उत्कट बलशाली नकुल-सहदेवने उन असंख्य गन्धर्वोंकी ओर लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०-११ ॥
अथ सर्वे रणं मुक्त्वा प्रयाताः खेचराः दिवम् ।
अस्मानेवाभिकर्षन्तो दीनान् मुदितमानसाः ॥ १२ ॥
फिर तो सारे गन्धर्व रणभूमि छोड़कर आकाशमें उड़ गये और मन-ही-मन आनन्दका अनुभव करते हुए हम दीन-दुखियोंको अपनी ओर घसीटने लगे ॥ १२ ॥
ततः समन्तात् पश्यामः शरजालेन वेष्टितम् ।
अमानुषाणि चास्त्राणि प्रमुञ्चन्तं धनंजयम् ॥ १३ ॥
इसी समय हमने देखा, चारों ओर बाणोंका जाल-सा बन गया है और उससे वेष्टित हो अर्जुन अलौकिक अस्त्रोंकी वर्षा कर रहे हैं ॥ १३ ॥
समावृता दिशो दृष्ट्वा पाण्डवेन शितैः शरैः ।
धनंजयसखाऽऽत्मानं दर्शयामास वै तदा ॥ १४ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे समस्त दिशाओंको आच्छादित कर दिया है, यह देखकर उनके सखा चित्रसेनने अपने-आपको उनके सामने प्रकट कर दिया ॥ १४ ॥
चित्रसेनः पाण्डवेन समाश्लिष्य परस्परम् ।
कुशलं परिपप्रच्छ तैः पृष्टश्चाप्यनामयम् ॥ १५ ॥