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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1656, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1656

दुर्बुद्धिर्हि कृता वीर भृशं दैवेन रक्षिताः ॥
**भीमसेन बोले—**वीरवर भैया युधिष्ठिर! आपको याद होगा, पहले इसी दुर्योधनने लाक्षागृहमें हमलोगोंको जलाकर भस्म कर देनेका घृणित विचार किया था; परंतु दैवने हमारी रक्षा की॥

कालकूटं विषं तीक्ष्णं भोजने मम भारत ।
उप्त्वा गङ्गां लतापाशैर्बद्ध्वा च प्राक्षिपत् प्रभो ॥
भरतकुलभूषण प्रभो! इसीने मेरे भोजनमें तीव्र कालकूट विष मिला दिया और मुझे लतापाशसे बाँधकर गंगाजीमें फेंक दिया था॥

द्यूतकाले हि कौन्तेय वृजिनानि कृतानि वै ।
द्रौपद्याश्च परामर्शः केशग्रहणमेव च ॥
वस्त्रापहरणं चैव सभामध्ये कृतानि वै ।
पुरा कृतानां पापानां फलं भुङ्क्ते सुयोधनः ॥
कुन्तीनन्दन! जूएके समय इसने बड़े-बड़े पाप किये हैं। द्रौपदीका स्पर्श, उसके केशोंको पकड़कर खींचना और भरी सभामें उसे नंगी करनेके लिये उसके वस्त्रोंका अपहरण करना—ये सब दुर्योधनके कुकृत्य हैं। पहलेके किये हुए पापोंका फल आज दुर्योधन भोग रहा है॥

अस्माभिरेव कर्तव्यो धार्तराष्ट्रस्य निग्रहः ।
अन्येन तु कृतं तच्च मैत्र्यमस्माभिरिच्छता ॥
उपकारी तु गन्धर्वो मा राजन् विमना भव ॥
इस धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको पकड़कर दण्ड देनेका काम तो हमलोगोंको ही करना चाहिये था; परंतु किसी दूसरेने हमारे साथ मैत्रीकी इच्छा रखकर स्वयं ही वह कार्य पूरा कर दिया। राजन्! आप उदास न हों; गन्धर्व हमलोगोंका उपकारी ही है॥

वैशम्पायन उवाच

एतस्मिन्नन्तरे राजंश्चित्रसेनेन वै हृतः ।
विललाप सुदुःखार्तो ह्रियमाणः सुयोधनः ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इसी समय चित्रसेनद्वारा अपहृत होता हुआ दुर्योधन अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो जोर-जोरसे विलाप करने लगा॥

दुर्योधन उवाच

पाण्डुपुत्र महाबाहो पौरवाणां यशस्कर ।
सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठ गन्धर्वेण हृतं बलात् ॥
रक्षस्व पुरुषव्याघ्र युधिष्ठिर महायशः ॥
भ्रातरं ते महाबाहो बद्ध्वा नयति मामयम् ।