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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1463, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1463

* कर्णपर्वके उनहत्तरवें अध्यायमें छियालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकोंमें एक कथा आती है। कौशिक नामका एक तपस्वी ब्राह्मण था। उसने यह व्रत ले लिया कि ‘मैं सदा सत्य बोलूँगा।’ एक दिन कुछ लोग लुटेरोंके भयसे छिपनेके लिये उसके आश्रमके पासके वनमें घुस गये। खोज करते हुए लुटेरोंने सत्यवादी कौशिकसे पूछा। उनके पूछनेपर कौशिकने सच्ची बात कह दी। पता लग जानेपर उन निर्दयी डाकुओंने उन लोगोंको पकड़कर मार डाला। इस प्रकार सत्य बोलनेके कारण लोगोंकी हिंसा हो जानेसे उस पापके फलस्वरूप कौशिकको नरक जाना पड़ा।

* धर्मकी गति सूक्ष्म होनेके कारण देखनेमें विपरीतता दीखती है; किंतु वास्तवमें वह पूर्वकृत कर्मोंका फल है।