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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1439, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1439

राजानो हि स्वधर्मेण श्रियमिच्छन्ति भूयसीम् ।
सर्वेषामेव वर्णानां त्राता राजा भवत्युत ॥ ३१ ॥
राजालोग अपने धर्मका पालन करते हुए ही प्रचुर सम्पत्ति पानेकी इच्छा रखते हैं और राजा सभी वर्णोंका रक्षक होता है ॥ ३१ ॥
परेण हि हतान् ब्रह्मन् वराहमहिषानहम् ।
न स्वयं हन्मि विप्रर्षे विक्रीणामि सदा त्वहम् ॥ ३२ ॥
ब्रह्मन्! मैं स्वयं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता। सदा दूसरोंके मारे हुए सूअर और भैंसोंका मांस बेचता हूँ ॥ ३२ ॥
न भक्षयामि मांसानि ऋतुगामी तथा ह्यहम् ।
सदोपवासी च तथा नक्तभोजी सदा द्विज ॥ ३३ ॥
मैं स्वयं मांस कभी नहीं खाता। ऋतुकाल प्राप्त होनेपर ही पत्नी-समागम करता हूँ। द्विजप्रवर! मैं दिनमें सदा ही उपवास और रातमें भोजन करता हूँ ॥ ३३ ॥
अशीलश्चापि पुरुषो भूत्वा भवति शीलवान् ।
प्राणिहिंसारतश्चापि भवते धार्मिकः पुनः ॥ ३४ ॥
शीलसे रहित पुरुष भी कभी शीलवान् हो जाता है। प्राणियोंकी हिंसामें अनुरक्त मनुष्य भी फिर धर्मात्मा हो जाता है ॥ ३४ ॥
व्यभिचारान्नरेन्द्राणां धर्मः संकीर्यते महान् ।
अधर्मो वर्धते चापि संकीर्यन्ते ततः प्रजाः ॥ ३५ ॥
राजाओंके व्यभिचार-दोषसे धर्म अत्यन्त संकीर्ण हो जाता है और अधर्म बढ़ जाता है, इससे प्रजामें वर्णसंकरता आ जाती है ॥ ३५ ॥
भेरुण्डा वामनाः कुब्जाः स्थूलशीर्षास्तथैव च ।
क्लीबाश्चान्धाश्च बधिरा जायन्तेऽत्युच्चलोचनाः ॥ ३६ ॥
उस दशामें भयंकर आकृतिवाले, बौने, कुबड़े, मोटे मस्तकवाले, नपुंसक, अंधे, बहरे और अधिक ऊँचे नेत्रोंवाले मनुष्य उत्पन्न होते हैं ॥ ३६ ॥
पार्थिवानामधर्मत्वात् प्रजानामभवः सदा ।
स एष राजा जनकः प्रजा धर्मेण पश्यति ॥ ३७ ॥
राजाओंके अधर्मपरायण होनेसे प्रजाकी सदा अवनति होती है। हमारे ये राजा जनक समस्त प्रजाको धर्मपूर्ण दृष्टिसे ही देखते हैं ॥ ३७ ॥
अनुगृह्णन् प्रजाः सर्वा स्वधर्मनिरताः सदा ।
(पात्येव राजा जनकः पितृवज्जनसत्तम ।)
ये चैव मां प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः ॥ ३८ ॥
सर्वान् सुपरिणीतेन कर्मणा तोषयाम्यहम् ।