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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1378, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1378

तेऽपि सर्वे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगैः ॥ १९ ॥
किंतु अंधे, गूँगे, बहरे आदि जिन-जिन ब्राह्मणोंको श्राद्धमें वर्जित बताया गया है, उन सबको वेदपारंगत ब्राह्मणोंके साथ श्राद्धमें सम्मिलित किया जा सकता है ॥ १९ ॥

प्रतिग्रहश्च वै देयः शृणु यस्य युधिष्ठिर ।
प्रदातारं तथाऽऽत्मानं यस्तारयति शक्तिमान् ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें यह बताता हूँ कि कैसे व्यक्तिको दान देना चाहिये। जो दाताको और अपने-आपको भी तारनेकी शक्ति रखता हो ॥ २० ॥

तस्मिन् देयं द्विजे दानं सर्वागमविजानता ।
प्रदातारं यथाऽऽत्मानं तारयेद् यः स शक्तिमान् ॥ २१ ॥
सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता मानव उसी ब्राह्मणको दान दे, जो दाताका तथा अपना भी संसारसागरसे उद्धार कर सके। वही शक्तिशाली ब्राह्मण है ॥ २१ ॥

न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैर्नानुलेपनैः ।
अग्नयः पार्थ तुष्यन्ति यथा ह्यातिथिभोजने ॥ २२ ॥
कुन्तीनन्दन! अतिथियोंको भोजन करानेसे अग्निदेव जितने संतुष्ट होते हैं, उतना संतोष उन्हें हविष्यका हवन करने तथा पुष्प और चन्दन चढ़ानेसे भी नहीं होता ॥ २२ ॥

तस्मात् त्वं सर्वयत्नेन यतस्वातिथिभोजने ।
पादोदकं पादघृतं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ॥ २३ ॥
प्रयच्छन्ति तु ये राजन् नोपसर्पन्ति ते समम् ।
इसलिये तुम सभी उपायोंसे अतिथियोंको भोजन देनेका प्रयत्न करो। राजन्! जो लोग अतिथिको चरण धोनेके लिये जल, पैरमें मलनेके लिये तेल, उजालेके लिये दीपक, भोजनके लिये अन्न तथा रहनेके लिये स्थान देते हैं, वे कभी यमराजके यहाँ नहीं जाते ॥ २३ ½ ॥

देवमाल्यापनयनं द्विजोच्छिष्टावमार्जनम् ॥ २४ ॥
आकल्पः परिचर्या च गात्रसंवाहनानि च ।
अत्रैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्व्यतिरिच्यते ॥ २५ ॥
नृपश्रेष्ठ! देवविग्रहोंपर चढ़े हुए चन्दन-पुष्प आदिको यथासमय उतारना, ब्राह्मणोंकी जूठन साफ करना, उन्हें चन्दन-माला आदिसे अलंकृत करना, उनकी सेवा-पूजा करना और उनके पैर आदि अंगोंको दबाना, इनमेंसे एक-एक कार्य गोदानसे भी अधिक महत्त्व रखता है ॥ २४-२५ ॥

कपिलायाः प्रदानात् तु मुच्यते नात्र संशयः ।
तस्मादलंकृतां दद्यात् कपिलां तु द्विजातये ॥ २६ ॥
कपिला गौका दान करनेसे मनुष्य निःसंदेह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसलिये कपिला गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान करना चाहिये ॥ २६ ॥