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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1348, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1348

संग प्राप्त होता है। चिरजीवी मनुष्योंके लिये यही महान् दुःख है ।। १८ ।।
पुत्रदारविनाशोऽत्र ज्ञातीनां सुहृदामपि ।
परेष्वायत्तताकृच्छ्रं किं नु दुःखतरं ततः ।। १९ ।।
अपनी आँखोंके सामने स्त्री और पुत्रोंकी मृत्यु होती है। भाई-बन्धु आदि जातिके लोगों और सुहृदोंका सदाके लिये वियोग हो जाता है तथा जीवन-निर्वाहके लिये दूसरोंके अधीन रहकर उनके तिरस्कारका कष्ट भोगना पड़ता है। इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या हो सकता है? ।। १९ ।।
नान्यद् दुःखतरं किञ्चिल्लोकेषु प्रतिभाति मे ।
अर्थैर्विहीनः पुरुषः परैः सम्परिभूयते ।। २० ।।
निर्धन मनुष्यको जो दूसरोंसे तिरस्कृत होना पड़ता है, इससे बढ़कर महान् कष्टकी बात संसारमें मुझे और कोई नहीं जान पड़ती है ।। २० ।।
अकुलानां कुले भावं कुलीनानां कुलक्षयम् ।
संयोगं विप्रयोगं च पश्यन्ति चिरजीविनः ।। २१ ।।
चिरजीवी मनुष्य अकुलीनोंके कुलकी उन्नति, कुलीनोंके कुलका संहार तथा संयोग और वियोग देखते रहते हैं ।। २१ ।।
अपि प्रत्यक्षमेवैतत् तव देव शतक्रतो ।
अकुलानां समृद्धानां कथं कुलविपर्ययः ।। २२ ।।
देव शतक्रतो! आप भी तो यह प्रत्यक्ष ही देख रहे हैं कि किस प्रकार समृद्धिशाली अकुलीन मनुष्योंके कुलमें उलट-फेर हो जाता है ।। २२ ।।
देवदानवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसाः ।
प्राप्नुवन्ति विपर्यासं किं नु दुःखतरं ततः ।। २३ ।।
देवता, दानव, गन्धर्व, मनुष्य, नाग तथा राक्षस—ये सभी विपरीत अवस्थामें पहुँचकर क्यासे क्या हो जाते हैं? इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा? ।। २३ ।।
कुले जाताश्च क्लिश्यन्ते दौष्कुलेयवशानुगाः ।
आढ्यैर्दरिद्राश्चाक्रान्ताः किं नु दुःखतरं ततः ।। २४ ।।
कुलीन मनुष्य भी नीच कुलके लोगोंके वशमें पड़कर क्लेश उठा रहे हैं और धनीलोग दरिद्रोंको सताते हैं। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ।। २४ ।।
लोके वैधर्म्यमेतत् तु दृश्यते बहुविस्तरम् ।
हीनज्ञानाश्च हृष्यन्ते क्लिश्यन्ते प्राज्ञकोविदाः ।। २५ ।।
बहुदुःखपरिक्लेशं मानुष्यमिह दृश्यते ।
लोकमें यह विपरीत अवस्था बहुत अधिक दिखायी देती है। ज्ञानहीन मूढ़ मनुष्य तो मौज करते हैं और श्रेष्ठ ज्ञानी मनुष्य क्लेश भोग रहे हैं। यहाँ मानवयोनिमें दुःख और क्लेशकी अधिकता ही दृष्टिगोचर होती है ।। २५ १/२ ।।