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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1327, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1327

युधिष्ठिर! कालसे प्रेरित होकर ही यह सारी प्रजा मोहग्रस्त होती है। अनघ! मैंने तुम्हारे सामने जो कुछ भी कहा है, उसमें तुम्हें किसी प्रकारकी शंका नहीं होनी चाहिये ॥ २९ ॥
आशङ्क्य मद्वचो ह्येतद् धर्मलोपो भवेत् तव ।
जातोऽसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ ॥ ३० ॥
कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत् समाचर ।
मेरे इस वचनमें संदेह करनेपर तुम्हारे धर्मका लोप होगा। भरतकुलभूषण। तुम कौरवोंके प्रख्यात कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन सब बातोंका पालन करो ॥ ३० १/२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् ॥ ३१ ॥
तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो ।
न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः ॥ ३२ ॥
करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो ।
युधिष्ठिरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है। विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा। ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है। प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा ॥ ३१-३२ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तु वचनं तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः ॥ ३३ ॥
संहृष्टाः पाण्डवा राजन् सहिताः शार्ङ्गधन्वना ।
विप्रर्षभाश्च ते सर्वे ये तत्रासन् समागताः ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! उन परम बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। साथ ही जो श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ पधारे थे, उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३३-३४ ॥
तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः ।
विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ॥ ३५ ॥
बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीके मुखसे वह मंगलमयी कथा सुनकर पुराणोक्त बातोंका ज्ञान हो जानेसे सब लोग बड़े ही विस्मित और प्रसन्न हुए ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि युधिष्ठिरानुशासने
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥