सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1311, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1311

युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ महर्षि मार्कण्डेयने वृष्णिप्रवर श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंको आनन्दित करते हुए पुनः इस प्रकार कहा— ।। ६ ।।

मार्कण्डेय उवाच

शृणु राजन् मया दृष्टं यत् पुरा श्रुतमेव च ।
अनुभूतं च राजेन्द्र देवदेवप्रसादजम् ।। ७ ।।
भविष्यं सर्वलोकस्य वृत्तान्तं भरतर्षभ ।
कलुषं कालमासाद्य कथ्यमानं निबोध मे ।। ८ ।।
**मार्कण्डेय बोले—**भरतश्रेष्ठ राजन्! मैंने देवाधिदेव भगवान् बालमुकुन्दकी कृपासे पूर्वकालमें, निकृष्ट कलिकालके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके भावी वृत्तान्तके विषयमें जो कुछ देखा-सुना या अनुभव किया है, वह बताता हूँ, सुनो और समझो ।। ७-८ ।।

कृते चतुष्पात् सकलो निर्व्याजोपाधिवर्जितः ।
वृषः प्रतिष्ठितो धर्मो मनुष्ये भरतर्षभ ।। ९ ।।
भरतश्रेष्ठ! सत्ययुगमें मनुष्योंके भीतर वृषरूप धर्म अपने चारों पादोंसे युक्त होनेके कारण सम्पूर्ण रूपमें प्रतिष्ठित होता है। उसमें छल-कपट या दम्भ नहीं होता ।। ९ ।।

अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः ।
त्रेतायां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ।। १० ।।
किंतु त्रेतामें वह धर्म अधर्मके एक पादसे अभिभूत होकर अपने तीन अंशोंसे ही प्रतिष्ठित होता है। द्वापरमें धर्म आधा ही रह जाता है। आधेमें अधर्म आकर मिल जाता है ।। १० ।।

त्रिभिरंशैरधर्मस्तु लोकानाक्रम्य तिष्ठति ।
तामसं युगमासाद्य तदा भरतसत्तम ।। ११ ।।
चतुर्थांशेन धर्मस्तु मनुष्यानुपतिष्ठति ।
आयुर्वीर्यमथो बुद्धिर्बलं तेजश्च पाण्डव ।। १२ ।।
मनुष्याणामनुयुगं ह्रसतीति निबोध मे ।
राजानो ब्राह्मणा वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर ।। १३ ।।
व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः ।
सत्यं संक्षेप्स्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः ।। १४ ।।
परंतु भरतश्रेष्ठ! कलियुग आनेपर अधर्म अपने तीन अंशोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंको आक्रान्त करके स्थित होता है और धर्म केवल एक पादसे मनुष्योंमें प्रतिष्ठित होता है। पाण्डुनन्दन! प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी आयु, वीर्य, बुद्धि, बल तथा तेज क्रमशः घटते जाते हैं। युधिष्ठिर! अब कलियुगके समयका वर्णन सुनो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी जातियोंके लोग कपटपूर्वक धर्मका आचरण करेंगे और धर्मका जाल बिछाकर दूसरे