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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1305, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1305

जो द्विजाति अच्छी तरह वेदोंका अध्ययन करके शान्तचित्त और क्रोधशून्य होकर नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा मेरी आराधना करते हैं, उन्हें ही मेरी प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥
प्राप्तुं न शक्यो यो विद्वन् नरैर्दुष्कृतकर्मभिः ।
लोभाभिभूतैः कृपणैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥ २५ ॥
तं मां महाफलं विद्धि नराणां भावितात्मनाम् ।
सुदुष्प्रापं विमूढानां मार्गं योगैर्निषेवितम् ॥ २६ ॥
विद्वन्! पापकर्मा, लोभी, कृपण, अनार्य और अजितात्मा मनुष्य जिसे कभी नहीं पा सकते वह महान् फल मुझे ही समझो। मैं ही शुद्ध अन्तःकरणवाले मानवोंको सुलभ होनेवाला योगसेवित मार्ग हूँ। मूढ़ मनुष्योंके लिये मैं सर्वथा दुर्लभ हूँ ॥ २५-२६ ॥
यदा यदा च धर्मस्य ग्लानिर्भवति सत्तम ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥ २७ ॥
दैत्या हिंसानुरक्ताश्च अवध्याः सुरसत्तमैः ।
राक्षसाश्चापि लोकेऽस्मिन् यदोत्पत्स्यन्ति दारुणाः ॥ २८ ॥
तदाहं सम्प्रसूयामि गृहेषु शुभकर्मणाम् ।
प्रविष्टो मानुषं देहं सर्वं प्रशमयाम्यहम् ॥ २९ ॥
महर्षे! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मका उत्थान होता है, तब-तब मैं अपने-आपको प्रकट करता हूँ। जब हिंसाप्रेमी दैत्य श्रेष्ठ देवताओंके लिये अवध्य हो जाते हैं तथा भयानक राक्षस जब इस संसारमें उत्पन्न हो अत्याचार करने लगते हैं तब मैं पुण्यात्मा पुरुषोंके घरोंपर मानवशरीरमें प्रविष्ट होकर प्रकट होता हूँ और उन दैत्यों एवं राक्षसोंका सारा उपद्रव शान्त कर देता हूँ ॥ २७—२९ ॥
सृष्ट्वा देवमनुष्यांस्तु गन्धर्वोरगराक्षसान् ।
स्थावराणि च भूतानि संहराम्यात्ममायया ॥ ३० ॥
मैं ही अपनी मायासे देवता, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस तथा स्थावर प्राणियोंकी सृष्टि करके समय आनेपर पुनः उनका संहार कर डालता हूँ ॥ ३० ॥
कर्मकाले पुनर्देहमविचिन्त्यं सृजाम्यहम् ।
आविश्य मानुषं देहं मर्यादाबन्धकारणात् ॥ ३१ ॥
फिर सृष्टि-रचनाके समय मैं अचिन्त्यस्वरूप धारण करता हूँ; तथा मर्यादाकी स्थापना एवं रक्षाके लिये मानव-शरीरसे अवतार लेता हूँ ॥ ३१ ॥
श्वेतः कृतयुगे वर्णः पीतस्त्रेतायुगे मम ।
रक्तो द्वापरमासाद्य कृष्णः कलियुगे तथा ॥ ३२ ॥
सत्ययुगमें मेरे शरीरका रंग श्वेत, त्रेतामें पीला, द्वापरमें लाल और कलियुगमें काला होता है ॥ ३२ ॥
त्रयो भागा ह्यधर्मस्य तस्मिन् काले भवन्ति च ।