महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! युगान्तकालमें सात-आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस-बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे ।। ६० ।।
भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा ।
आयुःक्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ।। ६१ ।।
सोलहवें वर्षमें मनुष्योंके बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी ।। ६१ ।।
क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः ।
तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते ।। ६२ ।।
महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील-स्वभाव बूढ़ोंका-सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा ।। ६२ ।।
विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चयित्वार्हतः पतीन् ।
व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ।। ६३ ।।
उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील-स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी ।। ६३ ।।
वीरपत्न्यस्तथा नार्यः संश्रयन्ति नरान् नृप ।
भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत ।। ६४ ।।
राजन्! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी ।। ६४ ।।
तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुषः क्षये ।
अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ।। ६५ ।।
महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोंतक वृष्टि बंद हो जाती है ।। ६५ ।।
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै ।
प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ।। ६६ ।।
पृथिवीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं ।। ६६ ।।
ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप ।
पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ।। ६७ ।।
नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं ।। ६७ ।।
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत ।
सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ ।। ६८ ।।