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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 129

भोजने भीमसेनस्य पापः प्राक्षेपयद् विषम् ।
कालकूटं नवं तीक्ष्णं सम्भूतं लोमहर्षणम् ॥ ८० ॥
जिस पापीने भीमसेनके भोजनमें नूतन, तीक्ष्ण, परिमाणमें अधिक एवं रोमांचकारी कालकूट नामक विष डलवा दिया था ॥ ८० ॥
तज्जीर्णमविकारेण सहान्नेन जनार्दन ।
सशेषत्वान्महाबाहो भीमस्य पुरुषोत्तम ॥ ८१ ॥
महाबाहु नरश्रेष्ठ जनार्दन! भीमसेनकी आयु शेष थी, इसीलिये वह घातक विष अन्नके साथ ही पच गया और उसने कोई विकार नहीं उत्पन्न किया (इस प्रकार उस दुर्योधनके अत्याचारोंको कहाँतक गिनाया जाय) ॥ ८१ ॥
प्रमाणकोट्यां विश्वस्तं तथा सुप्तं वृकोदरम् ।
बद्ध्वैनं कृष्ण गङ्गायां प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ॥ ८२ ॥
श्रीकृष्ण! प्रमाणकोटितीर्थमें, जब भीमसेन विश्वस्त होकर सो रहे थे, उस समय दुर्योधनने इन्हें बाँधकर गंगामें फेंक दिया और स्वयं चुपचाप राजधानीमें लौट आया ॥ ८२ ॥
यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संच्छिद्य बन्धनम् ।
उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः ॥ ८३ ॥
जब इनकी आँख खुली तो ये महाबली महाबाहु भीमसेन सारे बन्धनोंको तोड़कर जलसे ऊपर उठे ॥ ८३ ॥
आशीविषैः कृष्णसर्पैर्भीमसेनमदंशयत् ।
सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ॥ ८४ ॥
इनके सारे अंगोंमें विषैले काले सर्पोंसे डँसवाया; परंतु शत्रुहन्ता भीमसेन मर न सके ॥ ८४ ॥
प्रतिबुद्धस्तु कौन्तेयः सर्वान् सर्पानपोथयत् ।
सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान् ॥ ८५ ॥
जागनेपर कुन्तीनन्दन भीमने सब सर्पोंको उठा-उठाकर पटक दिया। दुर्योधनने भीमसेनके प्रिय सारथिको भी उलटे हाथसे मार डाला ॥ ८५ ॥
पुनः सुप्तानपाधाक्षीद् बालकान् वारणावते ।
शयानानार्यया सार्धं को नु तत् कर्तुमर्हति ॥ ८६ ॥
इतना ही नहीं, वारणावतमें आर्या कुन्तीके साथमें ये बालक पाण्डव सो रहे थे, उस समय उसने घरमें आग लगवा दी। ऐसा दुष्कर्म दूसरा कौन कर सकता है? ॥ ८६ ॥
यत्रार्या रुदती भीता पाण्डवानिदमब्रवीत् ।
महद् व्यसनमापन्ना शिखिना परिवारिता ॥ ८७ ॥