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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1287, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1287

ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा ।। ३५-३६ ।।
क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप ।
अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः ।। ३७ ।।
नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना-अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोंके कर्म करने लगेंगे। सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे ।। ३७ ।।
अल्पसारल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः ।
बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः ।। ३८ ।।
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः ।
भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः ।। ३९ ।।
मनुष्य नाटे कदके होंगे। उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा। बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे। सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोंसे भरी होंगी। युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य (अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे। शूद्र द्विजातियोंको भो (ऐ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूद्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे ।। ३८-३९ ।।
युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः ।
न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धा विशाम्पते ।। ४० ।।
पुरुषसिंह राजन्! युगान्तकालमें बहुतसे जीव-जन्तु उत्पन्न हो जायँगे। सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे ।। ४० ।।
रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः ।
बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः ।
मुखे भगाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४१ ।।
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
केशशूलाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ।। ४२ ।।
नरव्याघ्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे। राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान (बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी। उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा। युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी। राजन्! युगान्त-कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे। ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा (प्रायः) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी* ।। ४१-४२ ।।
अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप ।
अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ।। ४३ ।।
ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् ।
नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ।। ४४ ।।