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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1285, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1285

ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते। नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्चर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है ॥ २१½ ॥

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् ॥ २२ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ।
चार हजार दिव्य वर्षोंका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं (इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ॥ २२½ ॥

त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ॥ २३ ॥
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च ततः परम् ।
तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही (तीन-तीन) सौ दिव्य वर्ष होते हैं (इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है) ॥ २३½ ॥

तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः ॥ २४ ॥
तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ।
द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं (अतः सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं) ॥ २४½ ॥

सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम् ॥ २५ ॥
तस्य वर्षशतं संधिः संध्यांशश्च ततः परम् ।
संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय ॥ २६ ॥
तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं (इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है)। संध्या और संध्यांशका मान बराबर-बराबर ही समझो ॥ २५-२६ ॥

क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम् ।
एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या परिकीर्त्तिता ॥ २७ ॥
कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है। इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है ॥ २७ ॥

एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम् ।
विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्त्तते ॥ २८ ॥
लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधाः ।