महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय ।
अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान् बहून् ॥ १६ ॥
शत्रुविजयी युधिष्ठिर! मनुने उसे वहीं डाल दिया। अब वह मत्स्य अनेक वर्षोंतक उसीमें क्रमशः बढ़ता रहा ॥ १६ ॥
द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम् ।
तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन ॥ १७ ॥
कमलनयन! उस बावलीकी लम्बाई दो योजन और चौड़ाई एक योजनकी थी; परंतु उसमें भी उस मत्स्यका रहना कठिन हो गया ॥ १७ ॥
विचेष्टितुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते ।
मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १८ ॥
नराधिप कुन्तीनन्दन! वह उस बावलीमें हिल-डुल भी नहीं पाता था। अतः मनुको देखकर वह पुनः बोला— ॥ १८ ॥
नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम् ।
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ॥ १९ ॥
निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता ।
वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ ॥ २० ॥
‘भगवन्! साधुबाबा! अब आप मुझे समुद्रकी प्यारी पटरानी गङ्गाजीमें ले चलिये। मैं वहीं निवास करूँगा। अथवा तात! आप जहाँ उचित समझें, ले चलें। अनघ! मुझे दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा आपके आज्ञापालनमें स्थिर रहना है; क्योंकि आपके कारण ही मैं भलीभाँति पुष्ट होकर इतना बड़ा हुआ हूँ’ ॥ १९-२० ॥
एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद् भगवान् वशी ।
नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वयं प्राक्षिपदच्युतः ॥ २१ ॥
मत्स्यके ऐसा कहनेपर जितेन्द्रिय, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् मनुने उसे स्वयं ले जाकर गङ्गामें डाल दिया ॥ २१ ॥
स तत्र ववृधे मत्स्यः किंचित्कालमरिंदम ।
ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥
गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो ।
समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति ॥ २३ ॥
उद्धृत्य गङ्गासलिलात् ततो मत्स्यं मनुः स्वयम् ।
समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ॥ २४ ॥
शत्रुदमन! फिर वह मत्स्य वहाँ कुछ कालतक बढ़ता रहा। फिर एक दिन मनुको देखकर उसने कहा—‘प्रभो! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गङ्गाजीमें हिल-डुल नहीं सकता। अतः मुझे शीघ्र ही समुद्रमें ले चलिये। भगवन्! आप प्रसन्न होकर मुझपर