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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1252, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1252

न चानुगच्छन्ति सुखानि भोगां-
स्तेषामयं नैव परश्च लोकः ॥ ९२ ॥
जो मूढ़ न विद्याके लिये, न तपके लिये और न दानके लिये ही प्रयत्न करते हैं एवं न धर्मपूर्वक संतानोत्पादनके लिये ही यत्नशील होते हैं, वे न तो सुख पाते हैं और न भोग ही भोगते हैं। उनके लिये न तो इस लोकमें सुख है और न परलोकमें ॥ ९२ ॥

सर्वे भवन्तस्त्वतिवीर्यसत्त्वा
दिव्यौजसः संहननोपपन्नाः ।
लोकादमुष्मादवनिं प्रपन्नाः
स्वधीतविद्याः सुरकार्यहेतोः ॥ ९३ ॥
राजा युधिष्ठिर! तुम सब लोग बड़े पराक्रमी और धैर्यवान् हो। तुममें अलौकिक ओज भरा है। तुम सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हो और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये परलोकसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हो। यही कारण है कि तुमने सभी उत्तम विद्याएँ सीख ली हैं ॥ ९३ ॥

कृत्वैव कर्माणि महान्ति शूरा-
स्तपोदमाचारविहारशीलाः ।
देवानृषीन् प्रेतगणांश्च सर्वान्
संतर्पयित्वा विधिना परेण ॥ ९४ ॥
स्वर्गं परं पुण्यकृतो निवासं
क्रमेण सम्प्राप्स्यथ कर्मभिः स्वैः ।
मा भूद् विशङ्का तव कौरवेन्द्र
दृष्ट्वाऽऽत्मनः क्लेशमिमं सुखार्हम् ॥ ९५ ॥
तुम सभी शूर-वीर तथा तपस्या, इन्द्रियसंयम और उत्तम आचार-व्यवहारमें सदा ही तत्पर रहनेवाले हो। अतः (इस संसारमें बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य करके) देवताओं, ऋषियों और समस्त पितरोंको उत्तम विधिसे तृप्त करोगे। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप तुम सब लोग क्रमसे पुण्यात्माओंके निवास स्थान परम स्वर्गलोकको चले जाओगे। इसीलिये कौरवराज! तुम (अपने वर्तमान कष्टको देखकर) मनमें किसी प्रकारकी शंकाको स्थान न दो। यह क्लेश तो तुम्हारे भावी सुखका ही सूचक है ॥ ९४-९५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
॥ १८३ ॥

इस प्रकार श्रीमद्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥