सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1209, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1209

खो जायगा' ।। २२ ।।
इति चाप्यहमश्रौषं वचस्तेषां दयावताम्
मयि संजातहार्दानाम् अथ तेऽन्तर्हिता द्विजाः ।। २३ ।।
इस प्रकार मेरे प्रति हार्दिक दयाभाव उत्पन्न हो जानेके कारण उन दयालु महर्षियोंने जो बात कही थी, वह भी मैंने स्पष्ट सुनी। तत्पश्चात् वे सारे ब्रह्मर्षि अन्तर्धान हो गये ।। २३ ।।
सोऽहं परमदुष्कर्मा वसामि निरयेऽशुचौ
सर्पयोनिमिमां प्राप्य कालाकाङ्क्षी महाद्युते ।। २४ ।।
महाद्युते! इस प्रकार मैं अत्यन्त दुष्कर्मी होनेके कारण इस अपवित्र नरकमें निवास करता हूँ। इस सर्पयोनिमें पड़कर इससे छूटनेके अवसरकी प्रतीक्षा करता हूँ' ।। २४ ।।
तमुवाच महाबाहुर्भीमसेनो भुजङ्गमम्
न च कुप्ये महासर्प न चात्मानं विगर्हये ।। २५ ।।
तब महाबाहु भीमने उस अजगरसे कहा—'महासर्प! न तो मैं आपपर क्रोध करता हूँ और न अपनी ही निन्दा करता हूँ ।। २५ ।।
यस्मादभावी भावी वा मनुष्यः सुखदुःखयोः
आगमे यदि वापाये न तत्र ग्लपयेन्मनः ।। २६ ।।
'क्योंकि मनुष्य सुख-दुःखकी प्राप्ति अथवा निवृत्तिमें कभी असमर्थ होता है और कभी समर्थ। अतः किसी भी दशामें अपने मनमें ग्लानि नहीं आने देनी चाहिये ।। २६ ।।
दैवं पुरुषकारेण को वञ्चयितुमर्हति
दैवमेव परं मन्ये पुरुषार्थो निरर्थकः ।। २७ ।।
'कौन ऐसा मनुष्य है, जो पुरुषार्थके बलसे दैवको वंचित कर सके। मैं तो दैवको ही बड़ा मानता हूँ, पुरुषार्थ व्यर्थ है ।। २७ ।।
पश्य दैवोपघाताद्धि भुजवीर्यव्यपाश्रयम्
इमामवस्थां सम्प्राप्तमनिमित्तमिहाद्य माम् ।। २८ ।।
'देखिये, दैवके आघातसे आज मैं अकारण ही यहाँ इस दशाको प्राप्त हो गया हूँ। नहीं तो मुझे अपने बाहुबलका बड़ा भरोसा था ।। २८ ।।
किंतु नाद्यानुशोचामि तथाऽऽत्मानं विनाशितम्
यथा तु विपिने न्यस्तान् भ्रातॄन् राज्यपरिच्युतान् ।। २९ ।।
'परंतु आज मैं अपनी मृत्युके लिये उतना शोक नहीं करता हूँ, जितना कि राज्यसे वंचित हो वनमें पड़े हुए अपने भाइयोंके लिये मुझे शोक हो रहा है ।। २९ ।।
हिमवांश्च सुदुर्गेाऽयं यक्षराक्षससंकुलः
मां समुद्वीक्षमाणास्ते प्रपतिष्यन्ति विह्वलाः ।। ३० ।।