महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1173, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारयम्
शस्त्रवर्षं महत् राजन् विद्याबलमुपाश्रितः ॥ २१ ॥
व्यामोहयं च तान् सर्वान् रथमार्गैश्चरन् रणे
तेऽन्योन्यमभिसम्मूढाः पातयन्ति स्म दानवान् ॥ २२ ॥
राजन्! उस समय मैंने विद्या-बलका आश्रय लेकर महती बाण-वर्षाके द्वारा उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी भारी बौछारको रोका और युद्ध-भूमिमें रथके विभिन्न पैंतरे बदलकर विचरते हुए उन सबको मोहमें डाल दिया। वे ऐसे किंकर्तव्यविमूढ हो रहे थे कि आपसमें ही लड़कर एक-दूसरे दानवोंको धराशायी करने लगे ॥ २१-२२ ॥
तेषामेवं विमूढानामन्योन्यमभिधावताम्
शिरांसि विशिखैर्दीप्तैर्न्यहनं शतसङ्घशः ॥ २३ ॥
इस प्रकार मूढ़चित्त हो आपसमें ही एक-दूसरेपर धावा करनेवाले उन दानवोंके सौ-सौ मस्तकोंको मैं अपने प्रज्वलित बाणोंद्वारा काट-काटकर गिराने लगा ॥ २३ ॥
ते वध्यमाना दैतेयाः पुरमास्थाय तत् पुनः
खमुत्पेतुः सनगरा मायामास्थाय दानवीम् ॥ २४ ॥
वे दैत्य जब इस प्रकार मारे जाने लगे, तब पुनः अपने उस नगरमें ही घुस गये और दानवी मायाका सहारा ले नगर सहित आकाशमें ऊँचे उड़ गये ॥ २४ ॥
ततोऽहं शरवर्षेण महता कुरुनन्दन
मार्गमावृत्य दैत्यानां गतिं चैषामवारयम् ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! तब मैं बाणोंकी भारी बौछार करके दैत्योंका मार्ग रोक लिया और उनकी गति कुण्ठित कर दी ॥ २५ ॥
तत् पुरं खचरं दिव्यं कामगं सूर्यसप्रभम्
दैतेयैर्वरदानेन धार्यते स्म यथासुखम् ॥ २६ ॥
सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाला दैत्योंका वह आकाशचारी दिव्य नगर उनकी इच्छाके अनुसार चलनेवाला था और दैत्यलोग वरदानके प्रभावसे उसे सुखपूर्वक आकाशमें धारण करते थे ॥ २६ ॥
अन्तर्भूभौ निपतति पुनरूर्ध्वं प्रतिष्ठते
पुनस्तिर्यक् प्रयात्याशु पुनरप्सु निमज्जति ॥ २७ ॥
वह दिव्य पुर कभी पृथ्वीपर अथवा पातालमें चला जाता, कभी ऊपर उड़ जाता, कभी तिरछी दिशाओंमें चलता और कभी शीघ्र ही जलमें डूब जाता था ॥ २७ ॥
अमरावतीसंकाशं तत् पुरं कामगं महत्
अहमस्त्रैर्बहुविधैः प्रत्यगृह्णं परंतप ॥ २८ ॥
परंतप! इच्छानुसार विचरनेवाला वह विशाल नगर अमरावतीके ही तुल्य था; परंतु मैंने नाना प्रकारके अस्त्रों द्वारा उसे सब ओरसे रोक लिया ॥ २८ ॥